ईरान-अमेरिका में जंग छिड़ी तो किसकी होगी जीत? जानें खामेनेई की ताकत

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. अब सवाल बार-बार उठ रहा है कि इतनी सैन्य ताकत होने के बावजूद अमेरिका और उसका सहयोगी इजरायल ईरान पर सीधे जमीनी हमला क्यों नहीं करते?

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश के बाद अरब सागर और आसपास के क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं. अमेरिका ने इस क्षेत्र में एयरक्राफ्ट कैरियर, उन्नत लड़ाकू विमान, मिसाइल से लैस युद्धपोत और THAAD जैसे अत्याधुनिक रक्षा सिस्टम तैनात किए हैं. 

यह तैनाती अमेरिका की लंबी दूरी से हमला करने की क्षमता को दर्शाती है. इसके बावजूद यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि इतनी सैन्य ताकत होने के बावजूद अमेरिका और उसका सहयोगी इजरायल ईरान पर सीधे जमीनी हमला क्यों नहीं करते.

ईरान की भौगोलिक बनावट 

इसका सबसे बड़ा कारण ईरान की भौगोलिक बनावट है, जो उसे प्राकृतिक रूप से सुरक्षित बनाती है. 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, तब वहां का भूभाग समतल था, जिससे टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को आगे बढ़ने में आसानी हुई थी. लेकिन ईरान की स्थिति बिल्कुल अलग है. यह एक ऊंचे पठार पर स्थित देश है, जिसके चारों ओर ऊंचे और कठिन पर्वत हैं. इन पहाड़ों की वजह से किसी भी बाहरी सेना के लिए अंदर प्रवेश करना बेहद मुश्किल हो जाता है. आक्रमणकारी सेना को संकरे रास्तों और दर्रों से गुजरना पड़ता है, जहां पहले से तैयार रक्षात्मक बल उन्हें आसानी से रोक सकते हैं.

ईरान के पश्चिमी हिस्से में फैली ज़ागरोस पर्वत श्रृंखला उसकी सुरक्षा की मजबूत दीवार मानी जाती है. लगभग 1600 किलोमीटर लंबी यह श्रृंखला इराक सीमा से लेकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य तक फैली हुई है. इस क्षेत्र में कई ऊंची चोटियां और जटिल पहाड़ी रास्ते हैं, जो सैन्य वाहनों और हथियारों की आवाजाही को कठिन बना देते हैं. इसके अलावा उत्तर में मौजूद अलबोर्ज पर्वत श्रृंखला भी एक और सुरक्षा कवच का काम करती है. इन पहाड़ों के पार विशाल रेगिस्तानी क्षेत्र हैं, जहां पानी और संसाधनों की भारी कमी है. ऐसे इलाकों में सेना के लिए लंबे समय तक युद्ध करना और सप्लाई बनाए रखना बेहद कठिन हो जाता है.

जमीनी सैन्य ढांचा 

ईरान ने अपनी रक्षा को मजबूत बनाने के लिए जमीन के नीचे भी बड़े पैमाने पर सैन्य ढांचा तैयार किया है. उसने सुरंगों और भूमिगत ठिकानों का एक व्यापक नेटवर्क बनाया है, जिन्हें 'मिसाइल सिटी' कहा जाता है. इन ठिकानों में मिसाइलों का भंडारण, मरम्मत और लॉन्च की सुविधाएं मौजूद हैं. इसके अलावा ईरान ने पहाड़ों के भीतर भूमिगत एयरबेस भी बनाए हैं, जहां उसके लड़ाकू विमान सुरक्षित रह सकते हैं. इसका मकसद यह है कि अगर सतह पर मौजूद एयरबेस नष्ट भी हो जाएं, तो भी ईरान जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम रहे.

मिसाइल तकनीक

ईरान ने मिसाइल तकनीक पर भी खास ध्यान दिया है. उसने ऐसी मिसाइलें विकसित की हैं, जिन्हें जमीन के नीचे छिपाकर रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर अचानक लॉन्च किया जा सकता है. इसके साथ ही उसने हाई-स्पीड और हाइपरसोनिक मिसाइलों पर भी काम किया है, जिन्हें रोकना बेहद मुश्किल माना जाता है. इस तरह ईरान ने अपनी रक्षा को बहुस्तरीय और मजबूत बनाया है.

ईरान की सैन्य रणनीति

ईरान की सैन्य रणनीति भी काफी जटिल है. उसकी रक्षा प्रणाली कई स्वतंत्र सैन्य इकाइयों में विभाजित है, ताकि किसी एक केंद्र पर हमला होने के बाद भी बाकी इकाइयां सक्रिय रह सकें. इसके अलावा ईरान ने स्वयंसेवी बलों को गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया है, जिससे वे दुश्मन सेना को लंबे समय तक उलझाए रख सकें. इस रणनीति का उद्देश्य हमलावर सेना को थकाना और उसकी सप्लाई लाइन को कमजोर करना है.

इसके अलावा ईरान के पास हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य भी एक बड़ा रणनीतिक हथियार है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है. अगर युद्ध की स्थिति में यह मार्ग बंद हो जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है.

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