चिनाब पर सावलकोट डैम से फिर गरमाया भारत पाकिस्तान जल विवाद
चिनाब नदी पर भारत की सावलकोट परियोजना शुरू होते ही पाकिस्तान ने कड़ा विरोध जताया है। मामला सिर्फ बांध का नहीं, पानी, संधि और भरोसे का है। सवाल है आगे क्या होगा।

इंटरनेशनल न्यूज. भारत ने जम्मू कश्मीर में चिनाब नदी पर सावलकोट बिजली परियोजन का काम आगे बढ़ाया है। यह परियोजना करीब पांच हजार करोड़ रुपए की बताई जा रही है। भारत का कहना है कि यह उसका विकास अधिकार है। पाकिस्तान ने इसे संधि का उल्लंघन कहा है। इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच शब्दों की गर्मी बढ़ गई है। मामला फिर सिंधु जल संधि तक पहुंच गया है। सवाल अब सिर्फ बांध का नहीं रहा।
क्या संधि पर भरोसा टूटा?
1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। इसी समझौते के तहत नदियों के पानी का बंटवारा तय हुआ। पाकिस्तान का कहना है कि भारत ने संधि को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। भारत कहता है कि परियोजना नियमों के भीतर है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि देश के अंदर विकास परियोजनाएं भारत की समझ पर चलती हैं। यहां से विवाद की असली रेखा शुरू होती है। भरोसा ही सबसे बड़ी कमी दिख रहा है।
क्या यह जल निकासी नीति?
पाकिस्तान ने इस परियोजना को अपने खिलाफ जल निकासी नीति बताया है। उसका आरोप है कि भारत धीरे धीरे पानी पर नियंत्रण बढ़ा रहा है। इस्लामाबाद ने औपचारिक परामर्श मांगा है। सिंधु जल आयुक्तों के स्तर पर यह मामला उठाया गया है। पाकिस्तान ने पत्र भी भेजे हैं। उसका कहना है कि जानकारी साझा की जाए। भारत अभी अपने रुख पर कायम है।
क्या अंतरराष्ट्रीय मंच तैयार?
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने कहा है कि यह बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज है। उसने साफ कहा कि एकतरफा कदम स्वीकार नहीं होंगे। जरूरत पड़ी तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर चुनौती दी जाएगी। पाकिस्तान इसे अपने अस्तित्व से जोड़ रहा है। वहां की बड़ी आबादी पश्चिमी नदियों पर निर्भर है। पानी वहां सिर्फ संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। इसीलिए बयान इतने तीखे हैं।
क्या भारत का विकास अधिकार?
भारत का तर्क अलग है। उसका कहना है कि जलविद्युत परियोजनाएं बिजली और विकास के लिए जरूरी हैं। जम्मू कश्मीर जैसे क्षेत्र में ऊर्जा की जरूरत है। भारत यह भी कहता है कि परियोजना तकनीकी रूप से संधि के दायरे में है। यहां सवाल संतुलन का है। विकास और कूटनीति साथ चल पाएंगे या नहीं। यही असली परीक्षा है।
क्या मिडिल ईस्ट जैसा हाल?
पानी पर टकराव नया नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में जल विवाद तनाव बढ़ाते रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले भी कई बार मतभेद हुए। लेकिन संधि अब तक बची रही। इस बार हालात ज्यादा संवेदनशील लग रहे हैं। बयान ज्यादा सख्त हैं। माहौल ज्यादा अविश्वास भरा है। यही चिंता बढ़ाता है।
क्या रास्ता बातचीत से?
आखिरकार दोनों देशों को बात करनी ही होगी। पानी का विवाद गोली से नहीं सुलझता। तकनीकी और कानूनी बातचीत ही रास्ता है। विशेषज्ञों की भूमिका अहम होगी। अगर संवाद टूटा तो तनाव बढ़ेगा। अगर बातचीत मजबूत हुई तो समाधान निकलेगा। फिलहाल नजरें नई दिल्ली और इस्लामाबाद पर टिकी हैं। यही तय करेगा कि चिनाब शांति का सेतु बनेगा या नया मोर्चा।


