एपस्टीन कनेक्शन पर घिरी सरकार, पुरी के इस्तीफे की सीधी मांग

आम आदमी पार्टी ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दावा है कि वे जेफरी एपस्टीन से व्यक्तिगत तौर पर कई बार मिले। सवाल अब सिर्फ मुलाकात का नहीं, मकसद का है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

नई दिल्ली. आम आदमी पार्टी ने नया राजनीतिक सवाल खड़ा किया है। आरोप है कि हरदीप सिंह पुरी एपस्टीन से प्रतिनिधिमंडल के साथ नहीं मिले थे। वे निजी तौर पर कई बार मिले। अनुराग ढांडा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दस्तावेज दिखाए। उन्होंने कहा कि मेल और समय तय होने के रिकॉर्ड मौजूद हैं। अगर ये सही हैं तो मामला गंभीर है। पुरी का दावा अलग है।

क्या डेलिगेशन वाला दावा गलत?

पुरी ने पहले कहा था कि वे प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में मिले थे। लेकिन आप का कहना है कि मीटिंग्स व्यक्तिगत थीं। मेल में समय बदलने और घर पर मिलने की बात है। ये बातें औपचारिक नहीं लगतीं। ढांडा ने कहा कि यह सामान्य कूटनीतिक मुलाकात जैसा नहीं दिखता। सवाल यह है कि सच्चाई क्या है।

क्या मंत्री बनने से जुड़ाव?

आप ने यह भी पूछा कि ये मुलाकातें कब हुईं। दावा है कि 2014 से 2017 के बीच कई बैठकें हुईं। इसी दौर के बाद पुरी को मंत्री बनाया गया। क्या इन मुलाकातों का कोई संबंध था। क्या किसी सलाह के बदले कोई फायदा मिला। यह आरोप है, साबित नहीं। लेकिन राजनीति में सवाल ही सबसे बड़ा हथियार होता है।

क्या सरकार दबाव में है?

ढांडा ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अभी सभी फाइलें जारी नहीं की हैं। उन्होंने सीधा सवाल पूछा। क्या कोई दबाव है। क्या किसी फाइल को दबाए रखने के बदले कोई रियायत दी गई। यह बड़ा आरोप है। सरकार ने अब तक इस पर विस्तृत जवाब नहीं दिया। विपक्ष इसे मुद्दा बना रहा है।

क्या मेल में निजी भाषा?

आप का कहना है कि मेल में बहुत अनौपचारिक भाषा है। घर पर मिलने का जिक्र है। समय बदलने पर तुरंत सहमति दी गई। यह सब सामान्य सरकारी बैठक जैसा नहीं लगता। अगर ऐसा है तो सफाई जरूरी है। जनता को यह जानने का हक है।

क्या जांच की मांग बढ़ेगी?

आम आदमी पार्टी ने जांच की मांग की है। उनका कहना है कि भारतीय एजेंसियां इन दस्तावेजों की जांच करें। जब तक जांच हो, मंत्री पद से इस्तीफा दिया जाए। यह राजनीतिक मांग है। सरकार इसे राजनीतिक हमला बता सकती है। लेकिन सवाल उठ चुका है।

क्या आगे सियासी तूफान?

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रहा। इसमें सरकार की छवि भी जुड़ गई है। अगर दस्तावेज सही हैं तो जवाब देना होगा। अगर आरोप गलत हैं तो भी स्पष्ट बयान जरूरी है। राजनीति में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है। अब देखना है कि यह विवाद कितनी दूर तक जाता है। फिलहाल गेंद सरकार के पाले में है।

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