ईरान के साथ डील क्यों नहीं हुई? JD Vance ने पाकिस्तान से लौटते हुए खोला राज
अमेरिका और ईरान के बीच शांति की नई कोशिशें तेज हो गई हैं, लेकिन दशकों पुराना अविश्वास अभी भी दीवार की तरह खड़ा है. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा, रातोंरात यह भरोसा नहीं लौट सकता. पाकिस्तान में हुई 21 घंटे की मीटिंग बेनतीजा रही, क्योंकि परमाणु कार्यक्रम पर दोनों पक्षों के बीच गहरी खाई है.

दुनिया भर का ध्यान इन दिनों अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर केंद्रित है. इस बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक बयान देते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच दशकों से चला आ रहा अविश्वास और नफरत रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता. वेंस ने स्पष्ट किया कि भरोसे की भारी कमी ही शांति समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ईरानी पक्ष बातचीत के जरिए डील चाहता है और कूटनीति के दरवाजे अभी बंद नहीं हुए हैं.
अविश्वास की दीवार बनी रुकावट
दोनों देशों के बीच बातचीत तो चल रही है, लेकिन कोई भी पक्ष दूसरे पर पूरा यकीन करने को तैयार नहीं है. हाल ही में पाकिस्तान में दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच करीब 21 घंटे तक चली मैराथन बैठक में भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका. जेडी वेंस ने सकारात्मक संकेत देते हुए कहा कि ईरानी बातचीतकर्ता डील चाहते हैं, लेकिन समाधान आसान नहीं है.
क्या अगले दो दिनों में फिर मुलाकात संभव?
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या अगले दो दिनों के अंदर पाकिस्तान में दोनों देशों की एक और मुलाकात हो सकती है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए पाकिस्तान में फिर से बातचीत शुरू हो सकती है. पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम कड़ी बनकर उभरा है, जहां पर्दे के पीछे कूटनीतिक गतिविधियां तेज चल रही हैं. पिछले दौर की बातचीत में जेडी वेंस ने खुद अमेरिकी दल का नेतृत्व किया था, जो दशकों बाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी आमने-सामने की मुलाकात थी.
बातचीत फेल होने के मुख्य कारण
21 घंटे की लंबी बातचीत में डील फाइनल न हो सकने का सबसे बड़ा कारण परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा है. अमेरिका ईरान से कम से कम 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाने की मांग कर रहा है, जबकि ईरान केवल 5 साल की रोक पर अड़ा हुआ है. यह 15 साल का फासला दोनों के बीच सबसे बड़ी खाई बन गया है. इसके अलावा, एक-दूसरे की शर्तों को परखने के तरीके और भविष्य की गारंटी को लेकर भी सहमति नहीं बन पाई.
होर्मुज पर अमेरिकी नाकेबंदी का असर
बातचीत विफल होने के तुरंत बाद अमेरिका ने सख्त रुख अपनाते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों की नाकेबंदी शुरू कर दी है. अमेरिका अपनी सैन्य ताकत और आर्थिक दबाव के जरिए ईरान को बातचीत की मेज पर झुकने के लिए मजबूर करना चाहता है. इस नाकेबंदी से वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट गहराने का खतरा बढ़ गया है.
भविष्य की चुनौतियां और उम्मीद
फिलहाल दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक ओर बातचीत की उम्मीद बनी हुई है तो दूसरी ओर युद्ध और बढ़ने का खतरा भी मंडरा रहा है. अगले कुछ दिन यह तय करेंगे कि अमेरिका और ईरान अपने अविश्वास को पीछे छोड़कर किसी बड़े समझौते तक पहुंच पाते हैं या फिर यह नफरत जंग की आग को और भड़का देगी. कूटनीति की इस शतरंज में पाकिस्तान अब भी एक महत्वपूर्ण मैदान बना हुआ है.


