इस भारतीय ट्राइब को इजराइल क्यों ले जा रहे हैं बेंजामिन नेतन्याहू? अब तक 250 लोग हुए एयरलिफ्ट
बनेई मेनाशे दरअसल मिजोरम और मणिपुर के कुकी, चिन और मिजो जातीय समूहों का एक समुदाय है। इनका मानना है कि वे 2700 साल पहले निर्वासित हुए इजरायल के मनस्से कबीले के वंशज हैं।

नई दिल्ली: ईरान से करीब 4000 किलोमीटर दूर इजरायल ने भारत में एक बड़ा मिशन शुरू किया है। 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' नाम के इस अभियान के तहत पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों से बनेई मेनाशे समुदाय के करीब 5000 लोगों को मणिपुर से तेल अवीव ले जाया जा रहा है।
कई लोगों के लिए यह हिंसा वाले एक इलाके से दूसरे हिंसाग्रस्त क्षेत्र में जाना है। लेकिन बनेई मेनाशे समुदाय के लिए यह अपने पूर्वजों की जमीन पर लौटने की सदियों पुरानी यात्रा का अंत है। ये लोग खुद को इजरायल के बाइबिल वाले 'खोए हुए कबीलों' में से एक का वंशज मानते हैं।
कौन हैं बनेई मेनाशे?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बनेई मेनाशे दरअसल मिजोरम और मणिपुर के कुकी, चिन और मिजो जातीय समूहों का एक समुदाय है। इनका मानना है कि वे 2700 साल पहले निर्वासित हुए इजरायल के मनस्से कबीले के वंशज हैं। ये पारंपरिक रूप से यहूदी धर्म मानते हैं और 'शावेई इजराइल' संस्था की मदद से अपनी पैतृक भूमि इजरायल लौट रहे हैं।
बाइबल के मुताबिक प्राचीन इजरायल 12 कबीलों में बंटा था। बनेई मेनाशे का दावा है कि वे यूसुफ के बेटे मनस्से के वंशज हैं। 722 ईसा पूर्व में असीरियाई हमले के बाद इन्हें देश निकाला मिला। फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होते हुए करीब 10000 लोग भारत के पूर्वोत्तर में पहुंचे और मणिपुर-मिजोरम में बस गए।
IIT-दिल्ली के समाजशास्त्र शोधकर्ता आसफ रेंथलेई कहते हैं, “बनेई का मतलब 'बच्चे' और मनस्से का मतलब 'पोता' है।” यहूदी समुदाय के लिए भारत हमेशा सुरक्षित रहा है। यहां उन्हें कभी धार्मिक उत्पीड़न नहीं झेलना पड़ा। मणिपुर में इन्हें कुकी समुदाय का हिस्सा माना जाता है। 20वीं सदी में ज्यादातर कुकियों ने ईसाई धर्म अपना लिया, पर बनेई मेनाशे यहूदी परंपराओं से जुड़े रहे।
पहला जत्था रवाना, अब हर साल 1200 लोग जाएंगे
इजरायली सरकार ने गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को दिल्ली के रास्ते 250 लोगों का पहला जत्था भेजा। पिछले साल नेतन्याहू सरकार ने भारत से करीब 4600 लोगों को इजरायल में बसाने के लिए आर्थिक मदद का ऐलान किया था। पिछले 20 साल में करीब 5000 लोग वहां बस चुके हैं। इजरायल के इमिग्रेशन मंत्री ओफिर सोफर ने कहा, “यह अभियान की शुरुआत है। हर साल 1200 लोगों को इजरायल में बसाया जाएगा।”
इजराइल क्यों जाना चाहते हैं ये भारतीय
मणिपुर के बेंजामिन हाओकिप बताते हैं कि पहाड़ियों में धार्मिक सुविधाएं नहीं मिलतीं। उन्होंने 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' से कहा, "यहां हम सभी रीति-रिवाज नहीं निभा पाते। कुछ प्रार्थनाओं के लिए 'मिन्यान' यानी 10 यहूदी वयस्कों की जरूरत होती है, जो पहाड़ियों में मुश्किल है। हम धर्म के लिए इजरायल जाना चाहते हैं।" खाने-पीने और सांस्कृतिक संसाधनों की कमी भी बड़ी वजह है। कई लोगों ने Duolingo पर हिब्रू सीखना शुरू कर दिया है।
2005 से पहले आए बनेई मेनाशे के लोग हेब्रोन और गाजा की बस्तियों में बसे थे। गुरुवार को आए 250 लोग उत्तरी इजरायल में बसेंगे। इस इलाके पर हाल ही में हिज्बुल्लाह ने मिसाइलें दागी थीं। अब वहां संघर्ष विराम है। 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' के अनुसार इजरायली नागरिक बनने के लिए इन्हें धर्म बदलना होगा। प्रधानमंत्री नेतन्याहू का कहना है कि इनके बसने से उत्तरी और गैलिली इलाके मजबूत होंगे।


