क्या महिला क्रिकेट में खत्म होगी ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत? विश्वकप में भारत की जीत के बाद हरमनप्रीत कौर के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी
भारत की विश्व कप जीत ऐतिहासिक रही, लेकिन महिला क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया की दशकों पुरानी बादशाहत कायम है. 2026 भारत के लिए निरंतरता और बहुआयामी प्रतिभा साबित करने की परीक्षा होगी.

नई दिल्लीः महिला क्रिकेट में हालिया घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वर्चस्व किसे कहा जाए और विरासत कैसे बनती है. ऑस्ट्रेलियाई ऑलराउंडर ऐश गार्डनर के बयान में कोई भ्रम नहीं था. महिला विश्व कप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया का सफर थम गया और वह खिताब बचाने में असफल रहा, जबकि भारत ने नवी मुंबई में इतिहास रचते हुए ट्रॉफी अपने नाम की. हालांकि, एक टूर्नामेंट या एक हार से किसी टीम की महानता और वर्षों में बनी पहचान खत्म नहीं होती.
ऑस्ट्रेलिया का वर्चस्व
महिला क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया का दबदबा किसी संयोग का नतीजा नहीं है. 13 विश्व खिताब रातोंरात नहीं जीते जाते. इसके पीछे दशकों की मेहनत, मजबूत सिस्टम, बेहतरीन कौशल और जीत की संस्कृति है. यह वह टीम है जिसने हालात चाहे जैसे भी हों, लगातार प्रदर्शन करके खुद को दुनिया के लिए मानक के रूप में स्थापित किया है. जब तक आंकड़े और इतिहास बदले नहीं जाते, तब तक ऑस्ट्रेलिया ही वह पैमाना रहेगा, जिससे बाकी टीमें खुद को आंकेंगी.
भारत की जीत शुरुआत या मंजिल?
भारत की 2025 विश्व कप जीत ऐतिहासिक थी और उसने यह साबित किया कि टीम में दबाव में प्रदर्शन करने की क्षमता है. लेकिन किसी एक टूर्नामेंट को जीतना और लंबे समय तक अजेय बने रहना, दोनों में बड़ा अंतर है. विश्व चैंपियन बनना एक शुरुआत है, अंतिम मुकाम नहीं. सच्चा वर्चस्व तब बनता है जब टीम साल दर साल अपने स्तर को बनाए रखे.
विरासत की नींव
ऑस्ट्रेलियाई महिला क्रिकेट की नींव मार्गरेट जेनिंग्स ने रखी थी. 1978 में वह विश्व कप जीतने वाली पहली ऑस्ट्रेलियाई महिला कप्तान बनीं. उस जीत ने केवल एक ट्रॉफी नहीं दिलाई, बल्कि एक ऐसी सोच पैदा की जिसने आने वाली पीढ़ियों को दिशा दी. इसके बाद शेरोन ट्रेड्रिया, बेलिंडा क्लार्क, जोडी फील्ड्स और फिर मेग लैनिंग जैसी कप्तानों ने इस परंपरा को और ऊंचाइयों तक पहुंचाया. लैनिंग के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलिया ने पांच विश्व कप जीते और अपनी बादशाहत मजबूत की.
भारत में यह जिम्मेदारी अब हरमनप्रीत कौर के कंधों पर है. उन्होंने टीम को पहला विश्व खिताब दिलाकर इतिहास रचा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत भी ऐसा नेतृत्व और ऐसी निरंतरता पैदा कर पाएगा जो दशकों तक कायम रह सके.
बहुआयामी खिलाड़ियों की अहमियत
ऑस्ट्रेलियाई टीम की सबसे बड़ी ताकत उसकी गहराई और बहुमुखी प्रतिभा है. एक-दो खिलाड़ियों के चोटिल होने से टीम की संरचना नहीं डगमगाती, क्योंकि हर खिलाड़ी कई भूमिकाओं में ढल सकता है. बल्लेबाज अलग-अलग क्रम पर खेल सकते हैं और गेंदबाजी आक्रमण में भी विकल्पों की भरमार है.
भारत के लिए यही सबसे बड़ा सबक है. दीप्ति शर्मा जैसी खिलाड़ी के बाहर होते ही टीम का संतुलन बिगड़ जाता है. इसका समाधान डब्ल्यूपीएल और घरेलू ढांचे से निकल सकता है, जहां ऐसे खिलाड़ी तैयार किए जाएं जो हर प्रारूप में प्रभाव छोड़ सकें.
निरंतरता की परीक्षा
2025 भारत के लिए उपलब्धियों का साल था, लेकिन 2026 असली परीक्षा लेकर आएगा. टी20 विश्व कप नजदीक है और यह मौका भारत को यह साबित करने का अवसर देगा कि उसकी सफलता किसी एक टूर्नामेंट तक सीमित नहीं है. अगर भारत लगातार अच्छा प्रदर्शन करता है, तो वह ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत विरासत की ओर कदम बढ़ा सकता है.


