विरोध से समर्थक तक... पांच साल बाद बदली चिराग पासवान की सियासत, अब साथ मिलकर करेंगे नीतीश का घर रोशन या चमकाएंगे अपना आशियाना

बिहार की चुनावी आंच में, जहां राजनीतिक तीर-कमान अभी भी हवा में हैं वहां एक अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है. चिराग पासवान अब जेडीयू के कप्तान नीतीश कुमार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. 2020 में एनडीए से अलग होकर चिराग ने नीतीश को जो जख्म दिया था, वो अब पुरानी बात लगती है. सवाल ये है कि इस 'दोस्ताना गठबंधन' से किसका आशियां चमकेगा?

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

बिहार की राजनीति में कभी नीतीश कुमार के कट्टर आलोचक रहे चिराग पासवान की सियासी दिशा अब पूरी तरह बदल चुकी है. 2020 में एनडीए से अलग होकर उन्होंने नीतीश कुमार की जेडीयू को सबसे बड़ा झटका दिया था, लेकिन पांच साल के भीतर ही समीकरण ऐसे बदले कि अब वही चिराग पासवान एनडीए के मजबूत स्तंभ बनकर नीतीश कुमार के लिए फ्रंटफुट पर बैटिंग कर रहे हैं.

रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत संभाल रहे चिराग ने अपने सारे गिले-शिकवे भुलाते हुए एक बार फिर एनडीए में वापसी की है. इस बार 2025 के विधानसभा चुनाव में वह नीतीश कुमार और बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में उतर रहे हैं. सवाल अब यह है कि क्या चिराग पासवान इस बार नीतीश कुमार की सियासत को रोशनी दे पाएंगे?

क्यों चिराग बने थे नीतीश के लिए सिरदर्द?

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर अकेले मैदान में उतरने का बड़ा फैसला लिया था. उन्होंने 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें कई जेडीयू कोटे की सीटें भी शामिल थीं. उस समय चिराग ने कहा था कि वह नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ रहे हैं, लेकिन बीजेपी के साथ हैं.

हालांकि एलजेपी सिर्फ एक सीट जीत पाई, लेकिन उसके वोटों ने जेडीयू को भारी नुकसान पहुंचाया. जेडीयू सिर्फ 43 सीटों तक सिमट गई और तीसरे स्थान पर खिसक गई. अशोका यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा के मुताबिक, 120 से ज्यादा सीटों पर एलजेपी "वोट कटवा" साबित हुई थी. कई सीटों पर एलजेपी को मिले वोट अगर दूसरे नंबर के प्रत्याशी को मिलते तो नतीजे पलट सकते थे.

एनडीए में चिराग की वापसी से बदला समीकरण

चिराग पासवान के एनडीए में लौटने के बाद बिहार का सियासी गणित बदल गया है. 2024 के लोकसभा चुनाव में एलजेपी, जेडीयू और बीजेपी साथ मिलकर लड़ी थी, जिसका सीधा फायदा एनडीए को मिला. एलजेपी ने अपने हिस्से की सभी पांच सीटें जीतीं, जबकि जेडीयू ने 16 में से 12 और बीजेपी ने 17 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की. कुल 40 में से 30 सीटें एनडीए के खाते में गईं. चिराग अब नीतीश के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके साथ जीत की रणनीति बना रहे हैं.

2025 में चिराग का रोल कितना अहम?

इस बार एनडीए में सीट बंटवारे के तहत चिराग पासवान की पार्टी को 29 सीटें मिली हैं, जबकि जेडीयू और बीजेपी 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं. उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की पार्टियां 6-6 सीटों पर मैदान में हैं.

2020 में जेडीयू और एलजेपी के बीच जो वोट बिखराव हुआ था, इस बार उसकी संभावना नहीं है. दोनों दलों के नेताओं के बीच समन्वय बैठकों के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कार्यकर्ता एकजुट होकर काम करें.

चिराग के साथ क्या नीतीश को होगा फायदा?

विश्लेषकों का मानना है कि 2020 में जिन 25 सीटों पर एलजेपी की वजह से जेडीयू हारी थी, वहां इस बार चिराग के साथ आने से फायदा मिल सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में चिराग का 100 फीसदी स्ट्राइक रेट एनडीए के लिए प्रेरणा बना हुआ है. इस लिहाज से चिराग एनडीए के लिए मुफीद खिलाड़ी साबित हो सकते हैं.

दलित राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा

चिराग पासवान अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत के उत्तराधिकारी हैं. बिहार में दुसाध समाज पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. जातीय सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में दुसाधों की आबादी करीब 5.31 प्रतिशत है. यानी दलित वोटों का बड़ा हिस्सा पासवान समाज से आता है.

हाजीपुर, समस्तीपुर, वैशाली, गया और मुजफ्फरपुर जैसे इलाकों में दुसाध समुदाय की निर्णायक भूमिका होती है. 2020 के चुनाव में एलजेपी को 5.8 प्रतिशत वोट मिले थे, जो इस बात का संकेत है कि चिराग के साथ दुसाध वोटर पूरी तरह खड़े हैं.

चिराग की लोकप्रियता और 'बिहारी फर्स्ट' रणनीति

चिराग पासवान जातीय राजनीति से आगे निकलकर खुद को बिहारी अस्मिता के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं. उनका नारा बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट युवाओं और प्रथम बार वोटरों को आकर्षित करने का प्रयास है. वह रोजगार, विकास और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीति कर रहे हैं.

नीतीश-चिराग की नई दोस्ती

छठ महापर्व के खरना के दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चिराग पासवान के पटना आवास पर जाना बिहार की राजनीति में बड़ा संकेत था. पांच साल बाद हुई यह मुलाकात इस बात का प्रतीक बनी कि एनडीए में अब ऑल इज वेल है.

नीतीश और चिराग की मुलाकात ने साफ कर दिया है कि पुराने मतभेद खत्म हो चुके हैं और अब दोनों एकजुट होकर महागठबंधन के खिलाफ लड़ाई में जुटे हैं. खुद चिराग पासवान ने यह कहकर सियासी संकेत साफ कर दिए कि नीतीश कुमार सीएम हैं और आगे भी सीएम रहेंगे.

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