पेशवा बाजीराव से अहिल्याबाई तक... मणिकर्णिका घाट को किस-किसने संवारा?

वाराणसी का मणिकर्णिका घाट मोक्ष प्राप्ति का सबसे पवित्र स्थान माना जाता है. पौराणिक कथा है कि यहां भगवान विष्णु के कर्ण से मणि गिरी थी. महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 18वीं सदी में इसका भव्य मरम्मत करवाया.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

उत्तर प्रदेश: वाराणसी का मणिकर्णिका घाट एक बार फिर सुर्खियों में है. बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के बाद ‘महाश्मशान’ के नाम से प्रसिद्ध इस घाट को सुव्यवस्थित करने की जरूरत महसूस की गई, लेकिन हाल में किए जा रहे बदलावों को लेकर लोगों के एक वर्ग में नाराजगी भी देखने को मिल रही है. सदियों से आस्था, परंपरा और मृत्यु-दर्शन का प्रतीक रहा यह घाट आज बदलाव और विरासत के संतुलन को लेकर बहस के केंद्र में है.

हालांकि मणिकर्णिका घाट की पहचान केवल मौजूदा विवाद तक सीमित नहीं है. इसकी परतों में जलती चिताओं की लपटें, लकड़ियों से उठता धुआं और राख के ढेरों के बीच दबी हजारों वर्षों की कहानियां समाई हैं. पौराणिक मान्यताओं से लेकर ऐतिहासिक आक्रमणों और समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार तक, मणिकर्णिका घाट का इतिहास खुद में एक जीवंत दस्तावेज है.

पौराणिक ग्रंथों में मणिकर्णिका की महिमा

महाश्मशान का इतिहास पौराणिक काल तक जाता है. स्कंद पुराण के काशी खंड में उल्लेख मिलता है कि भगवान विष्णु ने यहां एक कुंड का निर्माण किया था. यही तथ्य मत्स्य पुराण में भी मिलता है, जहां मणिकर्णिका को पांच पवित्र जल-स्थलों में शामिल किया गया है.

यह स्थल शैव और वैष्णव परंपराओं के संगम का प्रतीक माना जाता है. घाट क्षेत्र में स्थित विष्णु चरणपादुका मंदिर इसी समन्वय को दर्शाता है, जहां संगमरमर की शिला पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हैं.

तप, वरदान और शिव-विष्णु का संगम

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां लगभग पांच लाख वर्षों तक तपस्या की थी. तपस्या से प्रसन्न होकर शिव यहीं निवास करने लगे. इसी कारण इस क्षेत्र में उत्तर की ओर विष्णु क्षेत्र और दक्षिण की ओर शिव क्षेत्र की स्पष्ट पहचान मिलती है.

ऐतिहासिक साक्ष्य और शुरुआती निर्माण

पौराणिक ग्रंथों के साथ-साथ ऐतिहासिक अभिलेख भी मणिकर्णिका घाट की प्राचीनता की पुष्टि करते हैं. पांचवीं शताब्दी के गुप्तकालीन अभिलेखों में इस घाट का उल्लेख मिलता है.

घाट की पत्थर की सीढ़ियां 1303 ईस्वी में बनाई गई थीं, हालांकि इनके निर्माता का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है. मुगल काल में भी स्थानीय शासकों और जमींदारों ने गुप्त दान के माध्यम से बाबा विश्वनाथ मंदिर और मणिकर्णिका घाट के संरक्षण में योगदान दिया.

आक्रमणों का दौर और संघर्ष

जब विदेशी आक्रांताओं के हमलों की आंच देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों तक पहुंची, तो वाराणसी भी इससे अछूती नहीं रही. 1664 ईस्वी में हुए एक बड़े हमले का उल्लेख इतिहास में मिलता है.

इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार, इस दौरान नागा संन्यासियों ने औरंगजेब की सेना का डटकर सामना किया. संघर्ष पूरे दिन चला और अंततः मुगल सेना को पीछे हटना पड़ा. 

मराठा काल में पुनर्निर्माण

1730 ईस्वी में बाजीराव पेशवा के संरक्षण में मणिकर्णिका घाट और इसकी सीढ़ियों का पुनर्निर्माण कराया गया. इसी दौर में काशी के प्रमुख शिव स्थलों से जुड़ी तारकेश्वर परंपरा भी सशक्त हुई. हालांकि 1735 ईस्वी में पास के घाट के निर्माण के दौरान भारी पत्थर संरचना के कारण भूस्खलन हो गया और निर्माण अधूरा रह गया. उस अधूरे ढांचे का एक हिस्सा आज भी देखा जा सकता है.

अहिल्याबाई होल्कर का ऐतिहासिक योगदान

1791 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मणिकर्णिका घाट का व्यापक जीर्णोद्धार कराया और इसे व्यवस्थित स्वरूप दिया. 1795 ईस्वी में उन्होंने यहां तारकेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, जिसे ‘उद्धार के स्वामी’ के रूप में जाना जाता है. मान्यता है कि यही शिव स्वरूप मृत आत्मा को तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करता है. दाह संस्कार के बाद तारकेश्वर पूजा की परंपरा आज भी निभाई जाती है.

आधुनिक दौर में मरम्मत और बदलाव

1830 ईस्वी में ग्वालियर की रानी बैजाबाई ने घाट की मरम्मत कराई. 1872 और फिर 1895 में भी आंशिक पुनर्निर्माण हुआ, जिसमें अलवर रियासत के महाराजा मंगल सिंह द्वारा बनवाया गया मनोकामेश्वर मंदिर प्रमुख है. 1965 ईस्वी में उत्तर प्रदेश सरकार ने घाट की मरम्मत कराई, जिसके बाद यह लंबे समय तक अपने मौजूदा स्वरूप में रहा. अब एक बार फिर नवीनीकरण कार्य चल रहा है, जिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

आस्था और बदलाव के बीच संतुलन की चुनौती

इतिहास गवाह है कि मणिकर्णिका घाट कभी स्थिर नहीं रहा. समय, सत्ता और समाज के साथ इसका स्वरूप बदलता रहा है. मौजूदा दौर में सवाल यही है कि विकास और बदलाव की इस नई प्रक्रिया में आस्था, परंपरा और विरासत का संतुलन कैसे साधा जाएगा.

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