अमेरिकी दालों पर टैक्स बढ़ाकर क्या भारत ने ट्रंप को दिया चुपचाप जवाब?
अमेरिकी दालों पर भारत द्वारा लगाए गए 30% आयात शुल्क को लेकर अमेरिका के दो सीनेटरों ने राष्ट्रपति ट्रम्प से आपत्ति जताई है, जिससे व्यापार वार्ता और उलझ सकती है. कृषि क्षेत्र भारत के लिए लाल रेखा होने के कारण यह दाल विवाद भारत-अमेरिका संबंधों में नई चुनौती बनता दिख रहा है.

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता लंबे समय से अटका हुआ है और इसी बीच दालों का मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में एक नई अड़चन बनकर उभरता दिख रहा है. हाल ही में अमेरिका के दो सीनेटरों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखकर भारत पर अमेरिकी दालों पर लगाए गए 30 प्रतिशत आयात शुल्क को हटाने की मांग की है.
शुल्क को दिया अनुचित करार
उन्होंने इस शुल्क को अनुचित बताते हुए कहा है कि इससे अमेरिकी किसानों को भारी नुकसान हो रहा है. यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब पहले से ही द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं जटिल दौर से गुजर रही हैं. नॉर्थ डकोटा के सीनेटर केविन क्रेमर और मोंटाना के सीनेटर स्टीव डेन्स ने अपने पत्र में बताया कि भारत ने 30 अक्टूबर को अमेरिका से आयात होने वाली पीली मटर पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जो 1 नवंबर से लागू हो गया.
यह फैसला अपेक्षाकृत शांत तरीके से लिया गया और न तो इसे बड़े स्तर पर प्रचारित किया गया और न ही इस पर ज्यादा सार्वजनिक चर्चा हुई. विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिका द्वारा पहले लगाए गए ऊंचे शुल्कों के जवाब में भारत की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है.
भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों ने क्या कहा?
भू-राजनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत ने इस बार खुलकर प्रतिक्रिया देने के बजाय चुपचाप जवाबी कार्रवाई की है. सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने इसे अमेरिकी टैरिफ नीति के प्रति भारत का संतुलित लेकिन स्पष्ट संकेत बताया. अमेरिकी सीनेटरों ने ट्रम्प से अपील की है कि भारत के साथ किसी भी संभावित व्यापार समझौते से पहले अमेरिकी दालों और मसूर को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच दिलाई जाए.
यह मुद्दा अमेरिका के उन राज्यों के लिए खासा अहम है, जहां कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. नॉर्थ डकोटा और मोंटाना जैसे राज्य मटर और दालों के प्रमुख उत्पादक हैं. दूसरी ओर, भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और वैश्विक खपत में उसका हिस्सा करीब 27 प्रतिशत है. भारत में चना, मसूर, मटर और सूखी फलियों की खपत सबसे अधिक होती है, लेकिन सरकार घरेलू किसानों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती रही है.
अमेरिकी सांसदों ने याद दिलाया कि ट्रम्प के पहले कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने इसी मुद्दे को उठाया था और तब 2020 की व्यापार वार्ताओं के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक यह बात पहुंचाई गई थी. उसी साल ट्रम्प भारत आए थे और अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रम्प’ कार्यक्रम के जरिए दोनों नेताओं ने मजबूत व्यक्तिगत संबंधों का प्रदर्शन किया था.
व्यापार समझौते पर विशेषज्ञों ने क्या कहा?
हालांकि, भारत के लिए कृषि और डेयरी क्षेत्र ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं, जिन पर वह समझौता करने को तैयार नहीं दिखता. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी व्यापार समझौते में भारतीय किसानों के हितों से समझौता किया गया, तो वह सौदा आगे नहीं बढ़ पाएगा. गौरतलब है कि 2024 के आम चुनावों से पहले भारत ने महंगाई को काबू में रखने के लिए कुछ दालों पर आयात शुल्क में ढील दी थी, लेकिन अब बदले हालात में यह मुद्दा एक बार फिर भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की परीक्षा ले रहा है.


