बजट 2026 में राहत का शोर, आम आदमी की थाली फिर भी हल्की ही रही

केंद्र सरकार का बजट 2026 भाषणों में उम्मीदें जगाता दिखा, मगर जमीनी हकीकत में आम परिवार को ठोस राहत नहीं मिली, सवाल वही रहे कि फायदा आखिर किसे हुआ।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

नई दिल्ली. बजट 2026 की सबसे बड़ी कसौटी आम आदमी होता है। सरकार ने राहत की कई घोषणाएं गिनाईं। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में फर्क कम दिखा। महंगाई से जूझता परिवार बजट से बड़ी उम्मीद लगाए बैठे थे। रसोई गैस, सब्जी और दूध सस्ते नहीं हुए। आमदनी बढ़ाने का कोई सीधा रास्ता नहीं दिखा। इसलिए सवाल उठा कि आम आदमी को आखिर मिला क्या।

क्या महंगाई पर लगाम लगी?

सरकार ने महंगाई काबू में होने के दावे किए। आंकड़ों में तस्वीर ठीक दिखाई गई। लेकिन बाजार की सच्चाई अलग रही। दाल, तेल और सब्जियों के दाम जस के तस हैं। किराया और स्कूल फीस बढ़ती जा रही है। बजट में महंगाई से लड़ने की ठोस दवा नहीं दिखी। यही कारण है कि भरोसा कमजोर पड़ा।

मध्यम वर्ग फिर क्यों चूका?

मध्यम वर्ग हर बजट में सबसे ज्यादा सुनता है। इस बार भी टैक्स राहत की उम्मीद थी। कुछ सीमित बदलाव जरूर दिखे। लेकिन महंगाई के मुकाबले ये राहत छोटी लगी। होम लोन और एजुकेशन खर्च जस के तस रहे। सेविंग्स पर दबाव और बढ़ा। इसलिए मध्यम वर्ग खुद को फिर ठगा महसूस कर रहा है।

ग्रामीण भारत को कितना फायदा?

ग्रामीण योजनाओं के लिए बजट में रकम दिखाई गई। कागजों में गांव मजबूत करने की बात हुई। लेकिन रोजगार और आय पर साफ रोडमैप नहीं दिखा। किसानों की लागत बढ़ती जा रही है। फसल के दाम स्थिर हैं। ग्रामीण परिवार की जेब हल्की ही रही। इससे गांव की चिंता और गहरी हुई।

नौकरी और रोजगार का क्या हाल?

युवाओं की सबसे बड़ी मांग नौकरी है। बजट में स्किल और स्टार्टअप की बातें दोहराईं गईं। लेकिन सीधी नौकरियों का जिक्र कम रहा। प्राइवेट सेक्टर पर भरोसा छोड़ दिया गया। सरकारी भर्तियों पर साफ संकेत नहीं मिले। युवा असमंजस में रह गया। रोजगार का सवाल फिर अधूरा रह गया।

स्वास्थ्य शिक्षा को क्यों नजरअंदाज किया?

स्वास्थ्य और शिक्षा आम आदमी की बुनियाद हैं। बजट में इनके लिए बढ़ोतरी सीमित रही। सरकारी अस्पतालों की हालत जस की तस है। स्कूलों की गुणवत्ता पर बड़ा निवेश नहीं दिखा। महंगी पढ़ाई परिवारों पर बोझ बनी रही। इलाज का खर्च डराता रहा। यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

बजट की दिशा किस ओर है?

पूरा बजट बड़े लक्ष्यों की भाषा बोलता है। विकास और निवेश पर जोर साफ दिखता है। लेकिन आम आदमी की रोज की परेशानी पीछे छूट गई। नीतियां ऊपर से मजबूत लगती हैं। नीचे असर कमजोर नजर आता है। यही फासला सबसे बड़ा सवाल है। 

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