अमेरिका लौटाएगा भारत की अनमोल धरोहर! अवैध रूप से चुराई गई 3 प्राचीन मूर्तियां आएंगी वापस

अमेरिका ने तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से बाहर ले जाई गई तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियां भारत को लौटाने का फैसला किया है. चोल और विजयनगर काल की ये अनमोल कृतियां लंबे शोध के बाद गैरकानूनी रूप से निर्यातित पाई गईं.

Shraddha Mishra

वाशिंगटन: भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक अहम और सकारात्मक कदम सामने आया है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह फैसला किया है कि तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से बाहर ले जाई गई तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियों को भारत को वापस सौंपा जाएगा. यह निर्णय लंबे और गहन शोध के बाद लिया गया है, जिससे यह साबित हुआ कि ये मूर्तियां गैरकानूनी तरीके से पवित्र मंदिर परिसरों से हटाई गई थीं. इस घटनाक्रम को भारत की सांस्कृतिक पहचान के लिए बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है.

वॉशिंगटन डीसी स्थित स्मिथसोनियन के राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि उत्पत्ति से जुड़े कठोर अनुसंधान के बाद इन कलाकृतियों को भारत सरकार को लौटाया जाएगा. संग्रहालय ने माना कि इन मूर्तियों का निष्कासन भारतीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए किया गया था. इस फैसले से संग्रहालय की जिम्मेदार और नैतिक संग्रह नीति भी सामने आती है.

संग्रहालय ने यह भी बताया कि भारत सरकार ने तीन में से एक कांस्य प्रतिमा को दीर्घकालिक ऋण पर अमेरिका में प्रदर्शित करने की अनुमति दी है. इस व्यवस्था के तहत संग्रहालय उस प्रतिमा की पूरी यात्रा, उसकी उत्पत्ति, अवैध निकासी और अंततः भारत वापसी की कहानी लोगों के सामने रख सकेगा. इसे पारदर्शिता और सांस्कृतिक जिम्मेदारी का उदाहरण माना जा रहा है.

चोल और विजयनगर काल की अनमोल कृतियां

लौटाई जा रही मूर्तियों में तीन ऐतिहासिक कृतियां शामिल हैं. पहली लगभग 990 ईस्वी की चोल काल की प्रसिद्ध ‘शिव नटराज’ प्रतिमा है. दूसरी 12वीं शताब्दी की चोल कालीन ‘सोमस्कंद’ मूर्ति है. तीसरी 16वीं शताब्दी की विजयनगर काल की ‘संत सुंदरार विद परवई’ प्रतिमा है. ये सभी मूर्तियां दक्षिण भारत की प्राचीन कांस्य ढलाई परंपरा की उत्कृष्ट मिसाल हैं और मूल रूप से मंदिरों की शोभायात्राओं में उपयोग की जाती थीं.

संग्रहालय की विशेषज्ञ टीम, क्यूरेटरों और पांडिचेरी स्थित फ्रांसीसी संस्थान के फोटो अभिलेखागार की मदद से इन मूर्तियों की असली पहचान सामने आई. शोध के दौरान यह पता चला कि इन मूर्तियों की तस्वीरें 1956 से 1959 के बीच तमिलनाडु के विभिन्न मंदिरों में ली गई थीं. इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने जांच कर पुष्टि की कि इन्हें गैरकानूनी तरीके से बाहर ले जाया गया था.

जाली दस्तावेजों का भी हुआ खुलासा

जांच में यह भी सामने आया कि शिव नटराज प्रतिमा को तंजावुर जिले के एक प्राचीन मंदिर से हटाया गया था और बाद में इसके अधिग्रहण में जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया. अन्य दो मूर्तियों के बारे में भी प्रमाण मिले कि वे मंदिरों से गायब होने के बाद विदेशी संग्रह में पहुंचीं.

संग्रहालय के निदेशक ने कहा कि संस्था सांस्कृतिक धरोहर की जिम्मेदारी से देखरेख करने और अपने संग्रह में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है. यह वापसी दिखाती है कि वैश्विक स्तर पर अब सांस्कृतिक विरासत को लेकर सोच बदल रही है.

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