UGC का आदेश या सामाजिक इंजीनियरिंग? हर यूनिवर्सिटी में इक्विटी कमेटी अनिवार्य, भाजपा बहुमत वाली समिति की सिफारिश पर उठा बवाल
UGC ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटी बनाना अनिवार्य किया है, जो SC, ST और OBC से जुड़े भेदभाव की शिकायतों का निपटारा करेगी. इस नियम का कुछ सवर्ण संगठनों ने विरोध किया है. यह फैसला संसद की बहुदलीय स्थायी समिति की सिफारिश पर लिया गया, जिसमें भाजपा सहित कई दलों के सांसद शामिल थे.

नई दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में एक अहम अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत देश के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों में एक “इक्विटी कमेटी” का गठन अनिवार्य कर दिया गया है. इस कमेटी का उद्देश्य संस्थान के भीतर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से जुड़े छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों को सुनना और तय समय-सीमा में उनका समाधान करना है. UGC का कहना है कि यह कदम शैक्षणिक परिसरों में समानता और न्याय सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है.
UGC के इस फैसले के बाद देश के कई हिस्सों में सवर्ण समाज के कुछ संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. उनका तर्क है कि इस तरह की कमेटियां सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकती हैं. विवाद इसलिए भी गहराया क्योंकि यह प्रावधान किसी एक राजनीतिक दल की पहल नहीं है, बल्कि संसद की एक स्थायी समिति की सिफारिश पर लाया गया है, जिसके अध्यक्ष कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हैं.
समिति में दिग्विजय सिंह समेत कुल 30 सदस्य
भाजपा के 16 ,कांग्रेस के 4, समाजवादी पार्टी के 3...
दलवार स्थिति देखें तो समिति में भाजपा के 16 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के 4, समाजवादी पार्टी के 3, तृणमूल कांग्रेस के 2, सीपीएम, डीएमके, एनसीपी (अजीत पवार गुट), एनसीपी (शरद पवार गुट) और आम आदमी पार्टी से एक-एक सदस्य शामिल रहे हैं. इस आंकड़े से यह स्पष्ट है कि समिति में भाजपा का दबदबा रहा है, बावजूद इसके सिफारिश सर्वसम्मति के माहौल में सामने आई.
राज्यसभा से शामिल प्रमुख नाम
राज्यसभा सदस्यों में दिग्विजय सिंह के अलावा भाजपा के भीम सिंह, घनश्याम तिवाड़ी, रेखा शर्मा, सी. सदानंदन मास्टर और सिकंदर कुमार शामिल हैं. इसके साथ ही सीपीएम के बिकास रंजन भट्टाचार्य, एनसीपी की सुनेत्रा पवार और आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता स्वाती मालीवाल भी इस समिति का हिस्सा रही हैं. इन नामों से साफ है कि समिति में अलग-अलग विचारधाराओं और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व था.
लोकसभा के सांसदों की लंबी सूची
लोकसभा से इस समिति में कई चर्चित चेहरे शामिल रहे हैं. इनमें भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा, कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज अभिजित गंगोपाध्याय, बांसुरी स्वराज, बृजमोहन अग्रवाल और दग्गुबाती पूरनदेश्वरी जैसे नाम प्रमुख हैं. कांग्रेस की ओर से अंगोमचा बिमोल अकोईजाम, डीएन कुरियाकोसे और वर्षा गायकवाड़ शामिल रहे, जबकि समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के सांसदों ने भी समिति में भूमिका निभाई.
सामूहिक निर्णय, लेकिन विवाद बरकरार
कुल मिलाकर, UGC की इक्विटी कमेटी से जुड़ा नियम किसी एक नेता या पार्टी का फैसला नहीं, बल्कि संसद की एक बहुदलीय समिति की सिफारिश का नतीजा है. इसके बावजूद सामाजिक स्तर पर इसे लेकर विरोध और समर्थन दोनों देखने को मिल रहे हैं. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह व्यवस्था शैक्षणिक संस्थानों में वास्तव में भेदभाव कम करने में कितनी कारगर साबित होती है और क्या इससे जुड़े विवाद शांत हो पाते हैं या नहीं.


