कब और कैसे फटते हैं बादल? जानिए इसके पीछे की साइंस और बचने का तरीका

इन दिनों मॉनसून के चलते देश के पहाड़ी राज्यों में तबाही का आलम है. हिमाचल के बाद अब उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बादल फटने की ताजा घटना ने एक बार फिर सभी को हिला कर रख दिया है. खीर गंगा नदी में आई अचानक बाढ़ से धराली बाजार पूरी तरह तबाह हो गया. ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर बादल फटता क्यों हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है.

Deeksha Parmar
Edited By: Deeksha Parmar

इन दिनों पूरे देश में मॉनसून ने कहर बरपाया हुआ है, लेकिन पहाड़ी राज्यों का हाल सबसे ज्यादा बेहाल है. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में हाल ही में बादल फटने की घटना ने जनजीवन को झकझोर कर रख दिया है. वहीं आज फिर उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली क्षेत्र में बादल फटने की घटना से भारी तबाही मच गई. अचानक आई बाढ़ ने पूरे धराली बाजार को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे दुकानों, वाहनों और स्थानीय संरचनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा है.

इस तबाही ने एक बार फिर लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बादल फटने की घटना होती क्या है, यह कब और कैसे होती है, और इससे बचने के उपाय क्या हैं. तो चलिए इसे विस्तार से समझते हैं.

क्या होता है बादल फटना?

मौसम विभाग के अनुसार, बादल फटना (Cloudburst) एक मौसमी और अत्यंत खतरनाक घटना है, जिसमें किसी एक स्थान पर बहुत कम समय में अत्यधिक मात्रा में बारिश होती है. इसे हिंदी में मूसलधार बारिश का सबसे तीव्र रूप कहा जा सकता है. इस दौरान बारिश की तीव्रता लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटे से भी ज्यादा हो सकती है. इसकी वजह से भूस्खलन, बाढ़ और भारी जान-माल का नुकसान होता है.

कब और कहां होती है ऐसी घटनाएं?

बादल फटने की घटनाएं आमतौर पर जून से सितंबर के बीच यानी मॉनसून सीजन में ज्यादा देखने को मिलती हैं. ये ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में होती हैं क्योंकि जब भारी मात्रा में नमी से भरे बादल ऊंचे पहाड़ों से टकराते हैं, तो वो वहीं रुक जाते हैं और उनका पानी एकसाथ जमीन पर गिरता है. नतीजा अचानक आई बाढ़ जैसी स्थिति और तबाही.

किस समय सबसे ज्यादा खतरा?

बादल फटने की घटनाएं प्रायः दोपहर या रात के समय ज्यादा होती हैं, जब वायुमंडल में गर्मी और नमी दोनों का स्तर उच्चतम होता है. इस दौरान लाखों लीटर पानी एक साथ गिरता है, जिससे नदी-नालों का जलस्तर बढ़ जाता है और पहाड़ों से मलबा, पत्थर, कीचड़ बहता हुआ आबादी तक पहुंच जाता है.

बादल फटने का वैज्ञानिक कारण

जब भारी मात्रा में नमी लिए बादल किसी ऊंचे पहाड़ से टकराते हैं.

क्षेत्र में हरियाली कम होने से वाष्पीकरण और नमी संतुलन बिगड़ता है.

अत्यधिक तापमान और जलवायु परिवर्तन भी इसकी बड़ी वजह हैं.

जब बादल आपस में टकराते हैं तो उनका घनत्व बढ़ जाता है और वो टूटकर वर्षा कर देते हैं.

कम दबाव वाले क्षेत्रों में जब गर्म और नम हवाएं तेजी से ऊपर उठती हैं, तो बादल फटने की संभावना बढ़ जाती है.

बादल फटे तो कैसे करें बचाव?

मौसम विभाग की तरफ से जारी अलर्ट को गंभीरता से लें.

लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना प्राथमिकता हो.

विशेष रूप से कच्ची जमीन पर निर्माण न करें.

ताकि पानी रुकने से नुकसान न हो.

किसी भी आपात स्थिति में घबराएं नहीं, निर्देशों का पालन करें.

इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा खतरा होता है.

यदि पहाड़ी इलाकों में निर्माण जरूरी हो तो वह भूकंप और जलप्रवाह सहन करने लायक हो.

भारत में बादल फटने की बड़ी घटनाएं

1998, मालपा (उत्तराखंड) – 225 लोगों की मौत, जिनमें 60 कैलाश मानसरोवर यात्री शामिल थे.

2004, बद्रीनाथ – करीब 17 लोगों की मौत.

2005, मुंबई – 26 जुलाई को भीषण क्लाउडबर्स्ट, सैकड़ों लोगों की मौत.

2013, केदारनाथ आपदा – लगभग 5000 से ज्यादा लोगों की मौत.

आपको बता दें कि बादल फटना एक गंभीर जलवायु घटना है, जिससे बचाव का एकमात्र उपाय समय रहते चेतावनी को समझना और त्वरित निर्णय लेना है. सरकार, प्रशासन और आम नागरिक सभी को सतर्कता और जागरूकता की आवश्यकता है ताकि इस विनाश को रोका जा सके या कम से कम हद तक नुकसान को टाला जा सके.

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