60 साल में कई उतार-चढ़ाव देख चुका LG पद, अब तरणजीत सिंह संधू के सामने क्या चुनौतियां?
दिल्ली को नया उपराज्यपाल मिल गया है और तरणजीत सिंह संधू अब राजधानी के 24वें LG होंगे. पिछले करीब 60 वर्षों में यह पद विकास, प्रशासनिक फैसलों और कई बड़े राजनीतिक विवादों का गवाह रहा है.

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को नया उपराज्यपाल मिल गया है. तरणजीत सिंह संधू अब दिल्ली के 24वें उपराज्यपाल के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे. पिछले करीब 60 वर्षों में यह पद विकास, प्रशासनिक सुधार और राजनीतिक विवाद तीनों का गवाह रहा है. ऐसे में नए एलजी के सामने भी कई प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हैं.
दिल्ली में उपराज्यपाल का पद 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम के तहत अस्तित्व में आया था, जब दिल्ली को आधिकारिक तौर पर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया. इससे पहले आजादी के बाद 1947 से यहां के प्रशासक ‘चीफ कमिश्नर’ कहलाते थे, लेकिन 1966 के बाद से उपराज्यपाल का पद औपचारिक रूप से स्थापित हुआ.
ए. एन. झा बने थे दिल्ली के पहले उपराज्यपाल
दिल्ली के पहले उपराज्यपाल ए. एन. झा (आदित्यनाथ झा) थे. उन्होंने 7 नवंबर 1966 से 19 जनवरी 1972 तक इस पद पर कार्य किया. उनके कार्यकाल में दिल्ली के बुनियादी ढांचे के विकास की दिशा में कई अहम पहल हुईं.
दिल्ली में रिंग रोड परियोजना को आगे बढ़ाने में झा ने तत्कालीन मुख्य कार्यकारी पार्षद विजय कुमार मल्होत्रा के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ए. एन. झा हिन्दी, मैथिली, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं के विद्वान माने जाते थे.
हाजिरजवाबी और प्रशासनिक सख्ती के लिए जाने जाते थे
राजधानी के पुराने लोग बताते हैं कि ए. एन. झा अपने तेज दिमाग और हाजिरजवाबी के लिए प्रसिद्ध थे. वे दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के कामकाज पर भी कड़ी नजर रखते थे.
उनकी स्मृति में रफी मार्ग के पास ‘आदित्य सदन’ का नाम रखा गया है. दिल्ली के कई उपराज्यपाल अपने कार्यकाल के दौरान उपलब्धियों और विवादों दोनों के कारण चर्चा में रहे हैं.
जगमोहन का कार्यकाल रहा सबसे चर्चित
दिल्ली के उपराज्यपालों में जगमोहन का नाम विशेष रूप से लिया जाता है. मूल रूप से पटेल नगर के निवासी जगमोहन दो बार (1980-81 और 1982-84) इस पद पर रहे.
1980 में पद संभालने के तुरंत बाद उन्होंने अवैध बस्तियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की, जिसे ‘स्लम क्लियरेंस’ अभियान के रूप में जाना गया. इस फैसले ने उस समय काफी चर्चा और विवाद भी पैदा किए.
तेजेंद्र खन्ना और पी. के. दवे के कार्यकाल की अहम भूमिका
पी. के. दवे (1992-97) का कार्यकाल दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) बनाने की दिशा में अहम माना जाता है. संविधान के 69वें संशोधन (1991) के बाद दिल्ली को सीमित विधायी शक्तियां मिलीं और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव आया.
तेजेंद्र खन्ना भी दो बार (1997-98 और 2007-13) दिल्ली के उपराज्यपाल रहे. उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान दिल्ली मेट्रो के विस्तार और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही.
नजीब जंग और आम आदमी पार्टी सरकार के बीच टकराव
हाल के वर्षों में उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच टकराव की स्थिति भी सामने आई. नजीब जंग (2013-16) का कार्यकाल खास तौर पर आम आदमी पार्टी सरकार के साथ विवादों के कारण सुर्खियों में रहा.
अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद सेवाओं जैसे पुलिस और भूमि के नियंत्रण को लेकर विवाद बढ़ा और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.
अनिल बैजल के कार्यकाल में कोरोना संकट
2016 में अनिल बैजल ने दिल्ली के उपराज्यपाल का पद संभाला. उनके कार्यकाल के दौरान कोविड-19 महामारी का बड़ा संकट सामने आया. उस समय दिल्ली में लॉकडाउन लागू किया गया और बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन अभियान चलाया गया.
हालांकि, इस दौरान भी आम आदमी पार्टी सरकार और उपराज्यपाल के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद देखने को मिले. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में एलजी की शक्तियों को सीमित करने से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले दिए.
विनय कुमार सक्सेना के कार्यकाल में भी विवाद
अनिल बैजल के इस्तीफे के बाद विनय कुमार सक्सेना ने उपराज्यपाल का पद संभाला. उनका कार्यकाल भी राजनीतिक खींचतान के कारण चर्चा में रहा.
खादी ग्रामोद्योग आयोग के पूर्व अध्यक्ष रहे सक्सेना ने पर्यावरण और शहरी विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया, लेकिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ ‘LG बनाम CM’ का विवाद लगातार चर्चा में बना रहा.
1984 के दंगों के दौरान पी. जी. गवई थे उपराज्यपाल
दिल्ली के इतिहास में 1984 के सिख विरोधी दंगों का दौर भी बेहद संवेदनशील रहा. उस समय पी. जी. गवई दिल्ली के उपराज्यपाल थे. उनकी मृत्यु बाद में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. उस समय यह कहा गया था कि उन्होंने आत्महत्या की थी.


