पहले से बढ़ी MP के किसानों की उम्मीदें...2026 के बजट से उचित सौदे की प्रतीक्षा कर रहे अन्नदाता
केंद्रीय बजट से पहले मध्य प्रदेश के किसान बड़ी उम्मीद लगाए बैठे हैं. देश के प्रमुख कृषि राज्य होने और केंद्रीय कृषि मंत्री का गृह क्षेत्र होने के कारण किसान एमएसपी बढ़ाने, फसल बीमा में समय पर भुगतान और बाजार सुरक्षा की मांग कर रहे हैं.

मध्य प्रदेश : केंद्रीय बजट के नजदीक आते ही मध्य प्रदेश एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है. देश में गेहूं और दालों के सबसे बड़े उत्पादक के रूप में पहचान बना चुके इस राज्य की उम्मीदें इस बार कुछ अधिक हैं. वजह सिर्फ इसकी कृषि ताकत नहीं, बल्कि यह भी है कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान इसी मिट्टी से आते हैं. ऐसे में किसानों को लग रहा है कि इस बार बजट में उनकी आवाज़ पहले से ज्यादा मजबूती से सुनी जाएगी. सीहोर के खेतों में लहलहाती फसलों के बीच एक सवाल लगातार तैर रहा है क्या यह बजट किसानों को सिर्फ घोषणाएं देगा या वाकई उनकी ज़िंदगी में राहत लाएगा?
कृषि का मजबूत स्तंभ है मध्य प्रदेश
मसालों के बाजार में भी मजबूत मौजूदगी
औषधीय फसलों के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है. अश्वगंधा, सफेद मुसली, गिलोय, तुलसी और कोलियस जैसी औषधीय फसलों के उत्पादन में राज्य का योगदान लगभग आधा है. इसके अलावा मसालों के बाजार में भी मध्य प्रदेश की मजबूत मौजूदगी है लहसुन, हल्दी, धनिया, मिर्च, जीरा और सौंफ के साथ-साथ टमाटर उत्पादन में भी राज्य शीर्ष पर है. यही विविधता इसे किसी भी राष्ट्रीय कृषि नीति में अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है.
किसानों की बढ़ती उम्मीदें और MSP की मांग
कृषि मंत्री का गृह राज्य होने के कारण किसानों को उम्मीद है कि 1 फरवरी को पेश होने वाला बजट उनकी वास्तविक समस्याओं को संबोधित करेगा. किसानों की प्राथमिक मांगें स्पष्ट हैं फसलों का लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य, समय पर फसल बीमा भुगतान और बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा देने वाली मजबूत व्यवस्था. किसानों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाई है. यही असंतुलन उनके संकट की जड़ है.
सीहोर: उपजाऊ जमीन, लेकिन सीमित आमदनी
सीहोर जिला इस विरोधाभास की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करता है. यहां की गहरी काली मिट्टी खरीफ और रबी दोनों मौसमों में खेती के लिए बेहद उपयुक्त है. जिले का बड़ा हिस्सा सिंचित है और सोयाबीन, चना, प्याज और लहसुन यहां की प्रमुख फसलें हैं. सीहोर का शरबती गेहूं अपनी गुणवत्ता, रंग और स्वाद के कारण देश–विदेश में पहचाना जाता है. फिर भी, किसानों का कहना है कि इतनी उपजाऊ जमीन और मेहनत के बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो पाती.
खेतों से उठती आम किसान की पीड़ा
उलझवान गांव में 50 वर्षीय रूप सिंह अपनी तीन एकड़ जमीन पर खेती कर अपने परिवार का पेट पालते हैं. उनके लिए खेती ही सब कुछ है, लेकिन इस साल प्याज की फसल उचित दाम न मिलने के कारण खेत में ही खराब हो गई. उनका कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी सब महंगे हो चुके हैं. ऐसे में यदि गेहूं और सोयाबीन के दाम नहीं बढ़ते, तो किसान कैसे टिकेगा? उनके भाई देव सिंह भी इसी चिंता को दोहराते हैं. उनका मानना है कि मौसम की मार, मुआवज़े की देरी और बाजार में सही कीमत न मिलना खेती को जोखिम भरा बना रहा है. भावांतर जैसी योजनाएं हैं, लेकिन भुगतान समय पर नहीं होता.
गांवों में गूंजती सामूहिक आवाज
जैसे-जैसे दिन चढ़ता है, खेतों की मेड़ों पर किसान इकट्ठा होने लगते हैं. कोई किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाने की बात करता है, तो कोई भंडारण की सुविधा की कमी की ओर इशारा करता है. किसानों का कहना है कि ये मांगें किसी अतिरिक्त सुविधा की नहीं, बल्कि खेती को ज़िंदा रखने की बुनियादी ज़रूरतें हैं. छोटे किसान विशेष रूप से खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
महिलाओं और छोटे किसानों की जमीनी सच्चाई
चंदेरी क्षेत्र में जमुनाबाई मेथी की फसल काटते हुए हिसाब लगाती हैं. बीज, खाद और दवाइयों का खर्च निकालने के बाद उनके हाथ में बहुत कम बचता है. वहीं पिपलिया मीरा गांव में संतोष मेवाड़ा बताते हैं कि प्याज की फसल उन्हें लागत से भी कम दाम पर बेचनी पड़ी. जब बाजार में कीमत बढ़ी, तब उनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा था.
बिचौलियों और कर्ज का दुष्चक्र
कई किसानों का मानना है कि फसल का असली फायदा किसान को नहीं, बल्कि बिचौलियों को मिलता है. कीमतें तब बढ़ती हैं जब फसल किसान के हाथ से निकल चुकी होती है. कुछ किसान कर्ज़ माफी और निर्यात नीति में सुधार की मांग कर रहे हैं, ताकि उन्हें बेहतर बाजार मिल सके और नुकसान की भरपाई हो सके.
बड़े किसान की चेतावनी और बजट से अपेक्षा
सीहोर के बड़े किसान एमएस मेवाड़ा मानते हैं कि अगर बजट में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और गंभीर होगी. उनका कहना है कि एमएसपी को वास्तविक लागत के अनुरूप तय करना होगा, साथ ही कृषि यंत्रों पर सब्सिडी, बीमा सुधार और किसानों के बच्चों के लिए रोजगार के अवसर भी जरूरी हैं.
राज्य सरकार की योजनाएं और किसानों की चिंता
मध्य प्रदेश सरकार ने 2026 को किसान कल्याण वर्ष घोषित किया है. सिंचाई, सौर पंप, बीज परीक्षण, मंडी सुधार और भावांतर योजना के विस्तार जैसे कई वादे किए गए हैं. हालांकि किसानों को डर है कि ये योजनाएं कागज़ों तक ही सीमित न रह जाएं. उनका कहना है कि असली परीक्षा तब होगी जब ये योजनाएं खेत तक पहुंचेंगी.
बजट से उम्मीद या एक और इंतजार?
सीहोर और आसपास के इलाकों में किसान बजट को सिर्फ एक घोषणा पत्र की तरह नहीं देख रहे. वे इसे अपने नुकसान, अपने कर्ज़ और अपनी सड़ती फसलों के आईने में परखेंगे. उनके लिए सवाल साफ है क्या यह बजट खेतों तक पहुंचेगा या फिर उम्मीदें एक बार फिर अधूरी रह जाएंगी?


