मीडिया से संवेदनशील जानकारी लीक करना पड़ेगा महंगा, केंद्र ने ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत कार्रवाई की दी चेतावनी

केंद्र सरकार ने संवेदनशील सूचनाओं के कथित लीक पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी मंत्रालयों को चेतावनी जारी की है. गृह मंत्रालय के गोपनीय नोट में साफ कहा गया है कि मीडिया से अनधिकृत संपर्क या वर्गीकृत जानकारी साझा करने पर Official Secrets Act के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सरकारी अधिकारियों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि मीडिया के साथ किसी भी "वर्गीकृत/संवेदनशील" जानकारी को साझा करना गंभीर परिणाम ला सकता है. ऐसे मामलों में आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) के तहत कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.

सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्रालय ने हाल ही में सभी मंत्रालयों और विभागों के सचिवों को एक गोपनीय नोट जारी कर इस संबंध में सख्त निर्देश दिए हैं. यह कदम हाल के समय में संवेदनशील सूचनाओं के कथित रिसाव की घटनाओं में वृद्धि के मद्देनजर उठाया गया है.

28 साल पुराने परिपत्र का अद्यतन संस्करण

बताया गया है कि पिछले महीने जारी यह नोट दिसंबर 1998 में जारी एक पुराने परिपत्र का अद्यतन रूप है. हालांकि, इस बार इसमें एक अहम बदलाव किया गया है.आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कार्रवाई की स्पष्ट चेतावनी जोड़ी गई है.

सूत्रों ने बताया कि परिपत्र में "अनाधिकृत या अवांछित तत्वों द्वारा संवेदनशील सूचनाओं के रिसाव की घटनाओं में अचानक वृद्धि" का उल्लेख किया गया है, जिससे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा को खतरा होने के साथ-साथ सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.

अनधिकृत मीडिया संपर्क पर "उचित कार्रवाई"

नोट में "मीडिया के साथ किसी भी अनधिकृत संचार" को निशाना बनाते हुए कहा गया है कि ऐसे मामलों में "उचित कार्रवाई" की जाएगी. हालांकि यह प्रावधान अधिकृत प्रवक्ताओं पर लागू नहीं होगा.

नोट में कहा गया है "सरकारी कर्मचारियों का यह कर्तव्य है कि वे अपने आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान प्राप्त होने वाली सूचनाओं और दस्तावेजों की सुरक्षा करें. मीडिया के साथ किसी भी अनधिकृत संचार पर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए, और किसी भी वर्गीकृत/संवेदनशील जानकारी को साझा करने की स्थिति में, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई पर विचार किया जाना चाहिए."

तीन पन्नों का यह सर्कुलर अर्धसैनिक बलों के प्रमुखों को भी भेजा गया है.

केंद्रीय सिविल सेवा नियमों का हवाला

सूत्रों के अनुसार, परिपत्र में यह भी दोहराया गया है -" यह दोहराया जाता है कि किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा इस प्रकार की लापरवाही केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमों के नियम 11 का स्पष्ट उल्लंघन है."

नियम 11 के अनुसार, कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना अधिकृत अनुमति के किसी भी सरकारी दस्तावेज या सूचना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से साझा नहीं कर सकता.

मीडिया प्रश्नों के लिए नई प्रक्रिया

नोट में अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि पत्रकारों के प्रश्नों को प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) को भेजा जाए या उत्तर देने से पहले संबंधित सचिव की अनुमति ली जाए. साथ ही यह सुझाव भी दिया गया है कि सरकारी कार्यालयों में मीडिया से बातचीत के लिए अलग क्षेत्र निर्धारित किया जा सकता है.

एक अन्य सूत्र के मुताबिक, नोट में मीडिया की "महत्वपूर्ण भूमिका" को स्वीकार किया गया है, लेकिन यह भी कहा गया है कि "अनाधिकृत सरकारी कर्मचारियों द्वारा कई मीडिया प्लेटफार्मों पर सूचना/गलत सूचना के त्वरित और असत्यापित प्रसार को रोकना आवश्यक है."

1998 के परिपत्र से अलग रुख

सरकारी हलकों में इस नोट को लेकर आश्चर्य जताया गया है, क्योंकि दिसंबर 1998 में जारी मूल परिपत्र केवल सलाहात्मक था और उसमें OSA का उल्लेख नहीं था. हालांकि दोनों परिपत्रों में एक समानता यह है कि दोनों में हालिया लीक का संदर्भ दिया गया है.

यह स्पष्ट नहीं है कि किस विशेष घटना के कारण जनवरी के दूसरे सप्ताह में यह नोट जारी किया गया.

संस्मरण विवाद की पृष्ठभूमि

हाल ही में हुई कैबिनेट बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि सत्ता में रहे अधिकारियों को पद छोड़ने के बाद 20 वर्ष तक किताबें या संस्मरण प्रकाशित करने की अनुमति न दी जाए. यह चर्चा पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' से जुड़े विवाद के बाद सामने आई.

अगस्त 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सैन्य गतिरोध के दौरान किए गए उनके दावों ने संसद के बजट सत्र के पहले चरण में राजनीतिक हलचल पैदा की थी.

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