पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को राहत देने से मना कर दिया. तेलंगाना हाईकोर्ट की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी गई है. कोर्ट ने खेड़ा को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में जवाब मांगा है. साथ ही कहा कि अगर अग्रिम जमानत चाहिए तो असम की अदालत में अर्जी लगाएं.

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बड़ा झटका देते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है. अब उनकी अस्थायी राहत समाप्त हो गई है. असम सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पवन खेड़ा को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि अग्रिम जमानत की मांग के लिए उन्हें असम की अदालत में ही याचिका दायर करनी होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के ट्रांजिट बेल आदेश पर तत्काल रोक लगा दी है. जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि जब मामला असम में दर्ज है, तो राहत भी वहीं से लेनी चाहिए.
असम सरकार की दलीलें
असम सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी कि जब केस असम में दर्ज हुआ है, तो तेलंगाना हाईकोर्ट इसमें दखल देकर जमानत कैसे दे सकता है. उन्होंने कहा कि कानूनी रूप से पवन खेड़ा को असम हाईकोर्ट जाना चाहिए था. मेहता ने यह भी बताया कि खेड़ा और उनकी पत्नी दिल्ली में रहते हैं और उनके पास दिल्ली के ही आईडी प्रूफ हैं. सिर्फ थोड़ी बहुत प्रॉपर्टी होने से तेलंगाना की अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं बन जाता.
कोर्ट का स्पष्ट रुख
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इन दलीलों को मानते हुए कहा कि कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मामला असम की अदालत का ही बनता है. अब पवन खेड़ा को राहत लेने के लिए असम की अदालत का रुख करना ही पड़ेगा.
मामले की शुरुआत
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पवन खेड़ा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी के खिलाफ कुछ गंभीर टिप्पणियां की थीं. इसी को लेकर असम में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी. अब मामला वापस उसी बिंदु पर पहुंच गया है जहां से शुरू हुआ था. आने वाले तीन हफ्ते पवन खेड़ा के लिए काफी व्यस्त रहने वाले हैं. उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करने के साथ-साथ असम की अदालत में भी अपना पक्ष रखना होगा.


