शिंदे गुट की बगावत से हिली BJP! नागपुर नगर निगम में सहयोगी ही बन गया सबसे बड़ा दुश्मन?

नागपुर महानगर निगम चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई है. यह सीएम देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गढ़ मानी जाती है. ऐसे में विपक्ष में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है.

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गढ़ मानी जाती है. यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है, इसलिए नागपुर महानगर निगम चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी है. पिछले 15 साल से बीजेपी यहां लगातार सत्ता में है और इस बार भी जीत का चौका लगाना चाहती है, लेकिन सहयोगी दलों की वजह से मुश्किलें बढ़ गई है. 

चुनावी समीकरण और दलों की स्थिति

नागपुर महानगर निगम में कुल 151 वार्ड है. 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 108 सीटें जीतकर अकेले बहुमत हासिल की थी. इस बार महायुति गठबंधन में बीजेपी ने 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना को सिर्फ 8 सीटें मिली है. 

कांग्रेस अकेले सभी 151 सीटों पर लड़ रही है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) 58 सीटों पर, शरद पवार की एनसीपी 76 सीटों पर और अजित पवार की एनसीपी 96 सीटों पर मैदान में है. राज ठाकरे की मनसे ने 22 सीटों पर उम्मीदवार उतारे है. इतने ज्यादा दावेदारों से वोटों का बंटवारा तय है.

शिंदे गुट के बागी बीजेपी के लिए चुनौती

बीजेपी ने शिंदे की शिवसेना को कम सीटें दीं, जिससे पार्टी के कई नेता नाराज हो गए. 30 से अधिक कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय नामांकन कर लिया और नाम वापस लेने के मूड में नहीं हैं. इनमें से कई नेता पहले बीजेपी से जुड़े रहे हैं.

शिंदे गुट के जिला प्रमुख, शहर प्रमुख और पूर्व पदाधिकारी जैसे लोग अब बीजेपी उम्मीदवारों के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. इससे हिंदुत्व वोटों में विभाजन का खतरा बढ़ गया है. बीजेपी के अपने कई पूर्व पार्षदों के टिकट कटने से भी अंदरूनी नाराजगी है, जो चुनावी नुकसान पहुंचा सकती है.

कांग्रेस की बढ़ी चिंता

अजित पवार की एनसीपी महायुति से अलग लड़ रही है और 96 सीटों पर मजबूत दावेदार उतारे हैं. कई पूर्व बीजेपी और कांग्रेस पार्षद उनके साथ आ गए हैं, जो बीजेपी के वोट काट सकते हैं. दूसरी तरफ शरद पवार की एनसीपी ने 76 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं.

दोनों पवार गुटों की वजह से कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका है. खासकर दलित, मुस्लिम और अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. कुछ वार्डों में कांग्रेस के अपने कार्यकर्ता भी निर्दलीय लड़ रहे हैं. 

फडणवीस के लिए साख की लड़ाई

नागपुर बीजेपी का मजबूत किला है. फडणवीस खुद यहां से युवा मेयर रह चुके हैं और बड़े विकास कार्यों का श्रेय लेते हैं. आरएसएस की मजबूत संगठन शक्ति भी बीजेपी के पक्ष में है. फिर भी सहयोगियों और बागियों की वजह से यह चुनाव अग्निपरीक्षा बन गया है. अगर बीजेपी यहां कमजोर प्रदर्शन करती है, तो राज्य स्तर पर भी उसकी साख प्रभावित होगी. 

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