SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस किया जारी, सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी?

केरल, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में मतदाता सूची के SIR (स्पेशल रिवीजन) को लेकर चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इस मुद्दे से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई करने की सहमति दे दी.

Anuj Kumar
Edited By: Anuj Kumar

नई दिल्ली: केरल, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में मतदाता सूची के SIR (स्पेशल रिवीजन) को लेकर चुनाव आयोग के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इस मुद्दे से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई करने की सहमति दे दी. जज सूर्यकांत, जज एस.वी.एन. भट्टी और जज जॉयमाल्या बागची की बेंच ने चुनाव आयोग को इस संबंध में नोटिस जारी किया है. अदालत ने उन सभी नई याचिकाओं पर भी सुनवाई की मांग मान ली है, जिनमें विभिन्न राज्यों में अलग-अलग आधार पर SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं.

कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी

केरल में SIR को चुनौती देने वाले एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि राज्य में जल्द ही स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं. ऐसे में SIR से जुड़ा मामला तुरंत सुना जाना जरूरी है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि केरल से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई 26 नवंबर को की जाएगी. बाकी राज्यों में SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई दिसंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में की जाएगी.

कई याचिकाओं पर सुनवाई जारी

सुप्रीम कोर्ट पहले ही पूरे देश में SIR कराने के चुनाव आयोग के निर्णय को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के एक बैच पर सुनवाई कर रही है. 11 नवंबर को अदालत ने द्रमुक, माकपा, पश्चिम बंगाल कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर भी आयोग से अलग-अलग जवाब मांगे थे. इन याचिकाओं में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी SIR को गलत बताते हुए चुनौती दी गई थी.

कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाए

वहीं, कांग्रेस ने इस पूरे मामले पर गंभीर आरोप लगाए हैं. पार्टी का कहना है कि मतदाता सूचियों का SIR आदिवासी समुदाय को चुनावी प्रक्रिया से दूर रखने की एक सोची-समझी योजना है. कांग्रेस के आदिवासी विभाग के प्रमुख विक्रांत भूरिया का कहना है कि आदिवासी आबादी के लिए एक मजबूत प्रवासन नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि उनके नाम मतदाता सूचियों से गायब न हों.

उन्होंने मध्य प्रदेश की सिविल जज परीक्षा-2022 के नतीजों पर भी सवाल उठाए. उनका आरोप है कि परीक्षा में एक भी आदिवासी उम्मीदवार का चयन नहीं होना इस बात का संकेत है कि आरक्षण को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. कुल मिलाकर, SIR को लेकर देशभर में राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है और आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मुद्दे को काफी प्रभावित कर सकता है.
 

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