सुप्रीम कोर्ट आज करेगा यूजीसी नियमों की चुनौती पर सुनवाई, चीफ जस्टिस बोले- हमें पता है क्या चल रहा है
सुप्रीम कोर्ट 29 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए समता विनियमन, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिसमें आरोप है कि ये नियम जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं और सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव कर सकते हैं. याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन बताया है.

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में अधिसूचित किए गए नए समता विनियमन (इक्विटी रेगुलेशन), 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. शीर्ष अदालत की वेबसाइट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ 29 जनवरी को करेगी.
याचिका में क्या आरोप लगाया गया?
इससे पहले, अदालत ने उस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई, जिसमें यूजीसी के नए नियमों को चुनौती दी गई थी. याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि आयोग ने जाति आधारित भेदभाव की एक असंवेदनशील और गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है, जिसके तहत कुछ वर्गों को संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण से बाहर कर दिया गया है.
प्रेट्र के अनुसार, सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने वकील की दलीलों पर गौर किया, जिन्होंने इस मामले में तात्कालिक सुनवाई की अपील की थी. वकील ने अदालत से कहा कि इन नए नियमों से सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव होने का खतरा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हमें स्थिति का पता है. सुनिश्चित करें कि जो कमियां हैं, उन्हें दूर किया जाए. हम इसे सूचीबद्ध करेंगे.
13 जनवरी को यूजीसी द्वारा अधिसूचित किए गए नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को "समानता समितियों" का गठन करने का निर्देश दिया गया है. इन समितियों का उद्देश्य भेदभाव की शिकायतों की जांच करना और संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना है. यूजीसी नियम, 2026 के अनुसार, इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, विकलांग व्यक्तियों और महिलाओं को सदस्य के रूप में शामिल करना अनिवार्य होगा.
नए नियमों ने यूजीसी नियम, 2012 को प्रतिस्थापित किया है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के खिलाफ दी गई है, जबकि सामान्य या गैर-आरक्षित वर्ग के लोगों को भेदभाव और उत्पीड़न का सामना होने पर संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण से प्रभावी ढंग से वंचित कर दिया गया है.
याचिका में यह भी कहा गया है कि यह नए नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और अनुच्छेद 15(1) (जो धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक लगाता है) का उल्लंघन करते हैं. इन नियमों के खिलाफ कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जहां छात्र समूह और विभिन्न संगठनों ने इन नियमों को तत्काल वापस लेने की मांग की है.
आलोचकों का क्या कहना है?
समाज के विभिन्न हिस्सों से इन नियमों को लेकर तीखी आलोचना हो रही है. आलोचकों का कहना है कि यूजीसी द्वारा स्थापित की गई समानता समितियां केवल कुछ विशेष जाति समूहों के खिलाफ भेदभाव की जांच करती हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को उत्पीड़न का सामना होने पर कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं दी गई है. यह उन्हें भेदभाव और असमानता के प्रति असुरक्षित बना सकता है.
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के मुद्दे से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि यह संविधान की बुनियादी धारा 14 और 15 के तहत सबको समान अधिकार और सुरक्षा देने की बात भी करता है. अदालत के इस फैसले से यह साफ हो जाएगा कि क्या यूजीसी के नए नियम वैधानिक रूप से सही हैं या वे भारतीय संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं.


