केदारनाथ-बद्रीनाथ में जैन, सिख और बौद्धों को छूट, मंदिर समिति ने साफ किया रुख

बीकेटीसी ने बद्रीनाथ-केदारनाथ सहित 47 मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव रखा है, जिसमें जैन, सिख और बौद्धों को छूट देकर प्रतिबंध केवल मुसलमानों और ईसाइयों पर लागू करने की बात कही गई है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने अपने अधीन आने वाले प्रमुख धार्मिक स्थलों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिस पर जल्द निर्णय लिया जा सकता है. समिति ने स्पष्ट किया है कि यह प्रस्ताव जैन, सिख और बौद्ध समुदायों पर लागू नहीं होगा, बल्कि केवल मुस्लिम और ईसाई धर्म को मानने वालों तक सीमित रहेगा. बीकेटीसी के अनुसार, बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम समेत कुल 47 प्रमुख मंदिर इसके दायरे में आते हैं.

बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने क्या कहा? 

बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सिख, जैन और बौद्ध धर्मों को हिंदू परंपरा का ही हिस्सा माना गया है. इसी आधार पर इन समुदायों को प्रस्तावित प्रतिबंध से बाहर रखा जाएगा. उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में होने वाली बोर्ड बैठक में औपचारिक मंजूरी के लिए रखा जाएगा.

द्विवेदी के अनुसार, राज्य के कई बड़े मंदिरों के प्रशासकों और पुजारियों की यह सामूहिक राय रही है कि मंदिरों की धार्मिक गरिमा और परंपरागत स्वरूप को बनाए रखने के लिए गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक आवश्यक है. उनका कहना है कि ये स्थल केवल पर्यटन केंद्र नहीं हैं, बल्कि सनातन आस्था के सर्वोच्च आध्यात्मिक धाम हैं, जहां धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का विशेष महत्व है.

प्रस्ताव पर तीखी प्रतिक्रियाएं

हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. विपक्षी कांग्रेस ने इसे राज्य सरकार द्वारा मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास बताया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि यह कदम बेरोजगारी, महंगाई और अन्य जनसरोकारों से लोगों का ध्यान हटाने की रणनीति है.

वहीं, देहरादून स्थित मुस्लिम सेवा संगठन ने इस प्रस्ताव को असंवैधानिक करार देते हुए आरोप लगाया कि इससे समाज में भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार को बढ़ावा मिलेगा. संगठन का कहना है कि इस तरह के फैसले भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं.

इन आलोचनाओं के बावजूद बीकेटीसी अध्यक्ष ने प्रस्ताव का बचाव किया है. उनका कहना है कि ऐतिहासिक रूप से इन मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश सीमित रहा है और अब इसे एक स्पष्ट नीति के रूप में लागू करने की जरूरत है. उन्होंने राज्य में ‘भूमि जिहाद’ और अवैध धार्मिक ढांचों के निर्माण की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि देवभूमि की पहचान और पवित्रता को सुरक्षित रखने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी है, ताकि उत्तराखंड का मूल धार्मिक स्वरूप बना रहे.

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