UGC के नए नियम से शिक्षा में इंसाफ उलटा, जांच से पहले सज़ा का डर गहराया
UGC के नए नियम ने 2012 की सुरक्षा हटाकर शिक्षा में भय बढ़ाया है। अब जाँच से पहले कार्रवाई का खतरा है। शिक्षक और छात्र खुद को आरोपी मानने को मजबूर हैं।

UGC ने 2012 का वह नियम हटाया जो झूठी शिकायतों से बचाव करता था। यह नियम इंसाफ की पहली सीढ़ी था। अब शिकायत आते ही कार्रवाई का रास्ता खुल जाता है। जाँच पूरी होने का इंतजार जरूरी नहीं रह गया। शिक्षक और छात्र पहले ही आरोपी मान लिए जाते हैं। निलंबन आसान हो गया है। बदनामी तेजी से फैलती है। करियर पर दाग तुरंत लगता है।
किसे मिली कार्रवाई की जल्दबाजी?
नए ढांचे में समय की प्राथमिकता बदली है। पहले जांच होती थी, अब कार्रवाई होती दिखती है। संस्थान जोखिम से बचने को तुरंत कदम उठाते हैं। प्रशासन अपनी जिम्मेदारी आगे बढ़ा देता है। शिकायत सही है या गलत, यह बाद की बात बन जाती है। पीड़ित का पक्ष देर से सुना जाता है। प्रक्रिया खुद हथियार बन जाती है। इंसाफ पीछे छूटता है।
कहां गया सुनवाई का अधिकार?
सुनवाई का अधिकार संविधान की रीढ़ है। 2012 का नियम इसी रीढ़ का सहारा था। हटते ही संतुलन डगमगा गया। अब नोटिस से पहले सजा जैसी स्थिति बनती है। जवाब देने का मौका सीमित दिखता है। रिकॉर्ड और सबूत बाद में देखे जाते हैं। नाम पहले खराब होता है। भरोसा अंत में लौटता है।
डर का असर पढ़ाई पर क्या?
डर से कक्षा का माहौल बदलता है। शिक्षक सवाल पूछने से कतराते हैं। छात्र असहमति दर्ज करने से बचते हैं। शिकायत का डर हर बातचीत में घुल जाता है। शोध के विषय सुरक्षित चुने जाते हैं। आलोचना की जगह चुप्पी आती है। शिक्षा बहस से दूर होती है। सीखने की आज़ादी सिमटती है।
किसकी सुविधा, किसका नुकसान?
नए नियम से प्रशासन को त्वरित सुविधा मिलती है। संस्थान कानूनी जोखिम से बचते हैं। पर शिक्षक और छात्र असुरक्षित होते हैं। एक शिकायत कई साल की मेहनत मिटा सकती है। सामाजिक छवि पल में गिरती है। बहाली मुश्किल हो जाती है। मानसिक दबाव बढ़ता है। नुकसान अक्सर स्थायी बनता है।
क्या पारदर्शिता तय की गई?
नियमों में जांच की साफ रूपरेखा नहीं दिखती। कौन जांच करेगा, यह स्पष्ट नहीं। समय सीमा तय नहीं है। झूठ तय करने की कसौटी अस्पष्ट है। सज़ा का अनुपात तय नहीं। अपील का रास्ता धुंधला है। जवाबदेही किसकी, यह अनकहा है। अनिश्चितता ही स्थिर हो जाती है।
आगे रास्ता कैसे सुधरे?
समाधान विरोध में नहीं, सुधार में है। जांच पहले और कार्रवाई बाद में तय हो। झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान लौटे। सुनवाई का अधिकार मजबूत बने। समयसीमा स्पष्ट हो। स्वतंत्र जांच सुनिश्चित हो। पारदर्शिता लिखित हो। तभी शिक्षा में भरोसा लौटेगा।


