मदनी मदरसे का गणतंत्र दिवस बताता है, देशभक्ति शोर नहीं समझ से पैदा होती है
कैथल के एक मदरसे में गणतंत्र दिवस पर कोई दिखावा नहीं था। यहां बच्चों को तिरंगा ही नहीं, नागरिक होने का मतलब भी समझाया गया। यही बात इस कार्यक्रम को खास बनाती है।

कैथल के सिरटा रोड पर स्थित मदनी मदरसे में गणतंत्र दिवस सामान्य नहीं था। यहां झंडा रस्म के लिए नहीं फहराया गया। बच्चे सलीके से खड़े थे। उनकी आंखें तिरंगे पर टिकी थीं। माहौल शांत था। शोर नहीं था। मोलाना मुहम्मद सईदूर रहमान ने झंडा फहराया। इसके बाद राष्ट्रगान गूंजा। यह दृश्य बताता था कि अनुशासन डर से नहीं समझ से आया है।
बच्चों को क्या समझाया गया?
यहां बच्चों को लंबा भाषण नहीं दिया गया। उन्हें आसान शब्दों में बताया गया कि गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है। उन्हें समझाया गया कि संविधान क्या होता है। यह भी बताया गया कि संविधान सबको बराबरी देता है। धर्म से ऊपर नागरिकता होती है। बच्चे ध्यान से सुन रहे थे। यह सुनना मजबूरी नहीं था। यह जिज्ञासा थी। यही शिक्षा की असली पहचान है।
ड्राइंग में क्या बोला गया?
ड्राइंग प्रतियोगिता में बच्चों को खुली आजादी दी गई। किसी विषय की पाबंदी नहीं थी। बच्चों ने वही बनाया जो उनके मन में था। किसी ने तिरंगा बनाया। किसी ने सैनिक की तस्वीर उतारी। किसी ने संविधान की किताब दिखाई। यह चित्र सजावट नहीं थे। ये सोच का आईना थे। आयशा अमीर की ड्राइंग सबसे ज्यादा पसंद की गई।
किताबें इनाम क्यों बनीं?
इनाम के नाम पर बच्चों को खिलौने नहीं दिए गए। उन्हें किताबें दी गईं। किताबें हाथ में आते ही बच्चों के चेहरे बदल गए। कुछ बच्चे तुरंत पन्ने पलटने लगे। यह छोटा दृश्य बड़ी बात कह गया। मदरसा पढ़ाई को सबसे ऊपर रखता है। संदेश साफ था। ज्ञान ही असली ताकत है। यही सोच बच्चों को आगे ले जाती है।
संविधान पर क्या कहा गया?
कार्यक्रम में बोलने वालों ने भारी शब्द नहीं चुने। उन्होंने सीधी बात कही। संविधान देश को जोड़ता है। यह किसी एक धर्म की किताब नहीं। यह सबकी सुरक्षा है। बराबरी की गारंटी है। मोलाना ने साफ कहा कि मदरसा शिक्षा और देशभक्ति साथ चल सकते हैं। दोनों में कोई टकराव नहीं है। बच्चों ने यह बात ध्यान से सुनी।
समाज की मौजूदगी क्यों जरूरी?
इस मौके पर कई सामाजिक लोग मौजूद थे। डॉ जमील। बिलाल। केसर अंसारी। शमशाद। असलम खान। अजहरुद्दीन। इरफान। इन लोगों की मौजूदगी औपचारिक नहीं थी। उन्होंने बच्चों से बात की। उनका हौसला बढ़ाया। इससे बच्चों को भरोसा मिला। संदेश गया कि समाज उनके साथ खड़ा है। मदरसा अकेला नहीं है।
अंत में क्या साबित हुआ?
कार्यक्रम का अंत देशभक्ति गीतों से हुआ। भारत माता की जय के नारे लगे। लेकिन यह जोश बनावटी नहीं था। यह समझ से पैदा हुआ था। यह कार्यक्रम दिखावा नहीं था। यह जवाब था। उन सवालों का जवाब जो मदरसों पर उठते रहते हैं। यहां साफ दिखा कि देशभक्ति किसी जगह की मोहताज नहीं। यह सोच से जन्म लेती है।


