UGC के नए नियम से शिक्षा में चुप्पी थोपने की तैयारी, सवाल पूछना बन सकता है जोखिम

UGC के नए नियम का असर जाति पर नहीं, सोच और आवाज़ पर दिखेगा। डर ऐसा बनाया गया है कि शिक्षक और छात्र बोलने से पहले ही चुप हो जाएं।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

इस नियम का असली निशाना जाति नहीं दिखता। इसका सीधा असर बोलने की आज़ादी पर पड़ता है। शिक्षक सवाल पूछे तो खतरा महसूस करता है। छात्र नीति पर बोले तो डर लगता है। शिक्षा का माहौल धीरे धीरे चुप होता जाता है। बहस कमजोर पड़ती है। असहमति को जोखिम माना जाने लगता है। यही सबसे बड़ा बदलाव है।

सवाल पूछना अब जोखिम क्यों?

अगर कोई शिक्षक प्रशासन से जवाब मांगता है तो रास्ता कठिन हो जाता है। अगर कोई छात्र फैसले का विरोध करता है तो उस पर उंगली उठ सकती है। नियम ऐसे हैं कि एक शिकायत काफी हो जाती है। सच और झूठ बाद में देखा जाएगा। पहले माहौल भारी हो जाएगा। यही डर बोलने से रोक देता है।

रिसर्च पर क्यों मंडराया खतरा?

विश्वविद्यालयों की आत्मा रिसर्च होती है। लेकिन सत्ता के खिलाफ निष्कर्ष देने वाली रिसर्च अब सुरक्षित नहीं लगती। शोधकर्ता सोचने लगता है कि कहीं शिकायत न आ जाए। विषय चुनते समय डर शामिल हो जाता है। निष्कर्ष नरम पड़ने लगते हैं। ज्ञान की धार कुंद होती है। यह नुकसान धीरे दिखता है।

शिकायत बना सबसे आसान हथियार?

नए नियम में शिकायत करना सबसे आसान रास्ता बन जाता है। जांच की प्रक्रिया साफ नहीं है। परिणाम का डर पहले से मौजूद है। इसलिए शिकायत सच हो या झूठ, असर एक जैसा पड़ता है। नाम खराब होता है। काम रुकता है। सफाई बाद में आती है। यही हथियार सबसे खतरनाक है।

विरोध नहीं, सोच क्यों रुकेगी?

यह नियम सीधे विरोध नहीं रोकता। यह सोच को रोक देता है। लोग बहस से पहले ही चुप हो जाते हैं। सवाल मन में दबा रह जाता है। यही चुप्पी सबसे बड़ी जीत बन जाती है। शिक्षा संवाद से नहीं, आदेश से चलने लगती है। कैंपस आज्ञाकारिता की जगह बनता है।

कक्षा का माहौल कैसे बदलेगा?

डर का असर कक्षा में दिखेगा। शिक्षक सुरक्षित बातें करेंगे। छात्र हां में हां मिलाएंगे। असहमति निजी हो जाएगी। खुले सवाल कम होंगे। चर्चा की जगह नोट्स हावी होंगे। सीखने की प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी। विश्वविद्यालय जीवंत नहीं रहेंगे।

भरोसा लौटेगा कैसे?

अगर शिक्षा को साइलेंस ज़ोन बनने से रोकना है तो नियम बदलने होंगे। बोलने की आज़ादी को साफ सुरक्षा देनी होगी। शिकायत और जांच की सीमाएं तय करनी होंगी। डर हटेगा तो संवाद लौटेगा। संवाद से ही शिक्षा मजबूत होती है। वरना सवाल यही रहेगा कि क्या विश्वविद्यालय सिर्फ आज्ञा मानने की जगह बनेंगे।

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