अजित पवार के निधन के बाद NCP को लेकर सियासी सवाल, क्या भाजपा का समर्थन मिलेगा?
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि पार्टी में मजबूत नेतृत्व की कमी है. शरद पवार के नेतृत्व में पार्टी का रुख फिर से भाजपा विरोधी हो सकता है, लेकिन इस बीच भाजपा एनसीपी को साथ रखने की कोशिश करेगी.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव चिह्न घड़ी की सुइयां अब स्थिर हो गई हैं, क्योंकि पार्टी के नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आकस्मिक निधन हो गया है. अब सवाल यह उठ रहा है कि अजित पवार के बिना एनसीपी का भविष्य क्या होगा और पार्टी की दिशा किस तरफ जाएगी.
राजनीतिक रणनीतिकारों का क्या मानना है?
राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना है कि एनसीपी महायुति सरकार का हिस्सा होने के कारण कुछ समय तक अस्तित्व में रह सकती है, लेकिन सत्ता से बाहर होने के बाद या आगामी चुनाव के समय टूटने की संभावना है. कई नेताओं का यह भी मानना है कि अजित पवार के बगैर एनसीपी में कोई मजबूत नेतृत्व की कमी महसूस होती है और मराठा राजनीति में उनका स्थान भरना आसान नहीं होगा.
अजित पवार ने जुलाई 2023 में अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर महाराष्ट्र सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया था और एकनाथ शिंदे की सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए थे. इस दौरान उन्होंने शरद पवार से एनसीपी और पार्टी का चुनाव चिह्न भी छीन लिया था. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में अजित पवार को केवल एक सीट ही मिली, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 41 सीटें जीतीं, जबकि शरद पवार की एनसीपी को केवल 10 सीटें मिलीं. इस बीच, महायुति में एनसीपी की स्थिति कमजोर होती जा रही थी और आगामी चुनावों में गठबंधन के संकेत भी नहीं मिल रहे थे. इस स्थिति में अजित पवार को खुद को अलग-थलग महसूस हो रहा था और यह एहसास उन्हें शरद पवार के करीब ले आया. चुनाव में दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ लड़ा, लेकिन व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचते रहे.
राज्य की राजनीति में कई सवाल खड़े
अब अजित पवार के निधन ने राज्य की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा एनसीपी को अपनी सरकार में बनाए रखेगी, खासकर जब पार्टी में कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं है. भाजपा ने संकेत दिए हैं कि उपमुख्यमंत्री का पद अभी भी एनसीपी के पास रहेगा, क्योंकि 2024 के चुनाव में भाजपा, शिवसेना शिंदे और एनसीपी (अजित पवार गुट) ने 288 में से 230 सीटें जीती थीं. हालांकि, हाल के निकाय चुनावों में एनसीपी को बड़ा झटका लगा था और दोनों गुटों के बीच एकता की संभावना पर विचार चल रहा था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है.
अब एनसीपी में केवल शरद पवार ही प्रमुख नेता रह गए हैं. अजित पवार के बिना उनकी पार्टी के कई नेताओं की निष्ठा एक बार फिर शरद पवार के साथ हो सकती है, लेकिन इस समय उनके साथ आने की संभावना कम ही है. ऐसे में, यह संभावना जताई जा रही है कि पवार परिवार के भीतर नेतृत्व का संकट पैदा हो सकता है. अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा या उनका बेटा पार्थ कमान संभाल सकते हैं. इसके अलावा, प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं का भी साथ बने रहने की उम्मीद जताई जा रही है.
भाजपा ने क्या संकेत दिए?
भाजपा ने यह संकेत दिए हैं कि पवार परिवार और एनसीपी के वरिष्ठ नेताओं को यह फैसला करना होगा कि वे पार्टी के भविष्य को लेकर क्या कदम उठाते हैं. भाजपा ने यह भी स्पष्ट किया है कि उपमुख्यमंत्री का पद एनसीपी के पास ही रहेगा. राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सुनेत्रा पवार के उपमुख्यमंत्री बनने के अधिक आसार हैं, जबकि उनका बेटा पार्थ राज्यसभा में जा सकता है, जिससे भाजपा के लिए स्थिति सुविधाजनक बन सकती है.
रही बात शरद पवार की, तो राजनीति के अनुभवी और माहिर नेता शरद पवार शायद ही अभी दोनों गुटों की एकता पर जोर देंगे. वह आगामी राजनीति की दिशा को देखते हुए ही इस बारे में निर्णय लेंगे. हालांकि, यह लगभग तय है कि शरद पवार भाजपा विरोधी राजनीति करते रहेंगे, क्योंकि उन्होंने हमेशा भाजपा से अपनी राजनीतिक दिशा अलग रखी है.
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी का भविष्य अब अनिश्चित है, लेकिन यह साफ है कि मराठा राजनीति में शरद पवार की भूमिका अहम बनी रहेगी. इस बीच, भाजपा और अन्य प्रमुख पार्टियां इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं और यह देखना बाकी है कि एनसीपी में नेतृत्व संकट का समाधान किस दिशा में जाएगा.


