अमेरिका-सऊदी के बाद पाकिस्तान की नई कूटनीति, अब बांग्लादेश पर टिकी नजर
2025 में पाकिस्तान रणनीतिक अलगाव से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है. बांग्लादेश के साथ बढ़ते संपर्क भारत की चिंता बढ़ा रहे हैं, क्योंकि बदलते राजनीतिक हालात क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं.

नई दिल्ली: पाकिस्तान में वर्ष 2025 को कई लोग लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक अलगाव के दौर के समाप्त होने के रूप में देख रहे हैं. इसके पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के शुरुआती महीनों में अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में आया अचानक बदलाव, सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग के बाद संबंधों में नई गर्मजोशी और पश्चिम एशिया में बदलती परिस्थितियों के बीच पाकिस्तान की बढ़ती भूमिका ने इस सोच को बल दिया है.
पाकिस्तान की सेना और सरकार ने एक सुनियोजित कथा के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की कि उन्होंने मई 2025 में भारत के सामने मजबूती से देश का नेतृत्व किया. इसी कहानी को आधार बनाकर पाकिस्तान खुद को फिर से क्षेत्रीय राजनीति में प्रासंगिक दिखाने की कोशिश कर रहा है. इसी क्रम में अब उसकी नजर बांग्लादेश पर है, जहां वह धीरे-धीरे अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है.
बांग्लादेश में बदलाव पर पाकिस्तान की दिलचस्पी
पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश में जुलाई 2024 में हुए राजनीतिक बदलाव के बाद ही नए समीकरणों के संकेत मिलने लगे थे. लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना के कार्यकाल में पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्ते बेहद ठंडे रहे थे. सत्ता परिवर्तन के बाद इस स्थिति को संबंध सुधारने के अवसर के रूप में देखा गया.
2025 में एक दशक से ज्यादा समय बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने बांग्लादेश का दौरा किया. इसके अलावा मंत्रिस्तरीय और सैन्य स्तर पर भी संपर्क बढ़े. व्यापार, आर्थिक सहयोग और सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करने जैसे मुद्दों पर सकारात्मक संकेत दिए गए. पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में पाकिस्तान की उच्चस्तरीय मौजूदगी भी इसी दिशा की ओर इशारा करती है.
क्यों बढ़ी भारत की चिंता
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं बांग्लादेश फिर से पूर्वी पाकिस्तान जैसी स्थिति की ओर न बढ़ जाए. 2024 में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रम की तेजी ने 1975 के उथल-पुथल भरे दौर की यादें ताजा कर दीं. शेख हसीना का लंबा शासन भारत-बांग्लादेश रिश्तों में स्थिरता, सहयोग और भरोसे का प्रतीक माना जाता था, खासकर व्यापार, निवेश और कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में. यदि बांग्लादेश के साथ संबंध बिगड़ते हैं, तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा और सीमा प्रबंधन पर पड़ेगा. बांग्लादेश के साथ सीमा केवल एक रेखा नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा से जुड़ी कई जटिलताओं से भरी हुई है.
बांग्लादेश की अंदरूनी खींचतान
बांग्लादेश को लेकर यह धारणा भी सामने आती है कि वहां 1947 और 1971 की सोच के बीच गहरा टकराव मौजूद है. एक ओर धार्मिक पहचान की राजनीति है, तो दूसरी ओर भाषाई और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद. इन प्रवृत्तियों को केवल भारत और पाकिस्तान के प्रभाव के रूप में देखने के बजाय, वहां की घरेलू राजनीति के हिस्से के रूप में समझना जरूरी है.
हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों पर हमलों और तीखे राजनीतिक बयानों ने भारत में जनमत को प्रभावित किया है. शेख हसीना को भारत में शरण दिया जाना भी विवाद का कारण बना हुआ है. अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखना और इस्लामी संगठनों का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय है.
वहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर का खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होना सकारात्मक संकेत माना जा सकता है. ऐसे संवाद और संपर्क आगे भी जारी रहने चाहिए, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और अनावश्यक टकराव से बचा जा सके.


