ईरान में मौतों के आंकड़ों पर टकराव: सरकारी दावा 2,000, विपक्षी रिपोर्ट में 12,000 से अधिक की आशंका
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन के बीच विपक्ष से जुड़ी वेवसाइट ईरान इंटरनेशनल ने यह दावा किया है कि विरोध प्रदर्शनों पर ईरानी सुरक्षा बलों की देशव्यापी कार्रवाई में कम से कम 12000 लोग मारे गए है, इसके साथ ही इसे ईरान के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ी हत्या माना जा रहा है.

नई दिल्ली : ईरान में हालिया सरकार विरोधी प्रदर्शनों को लेकर मौतों की संख्या पर गंभीर विवाद सामने आया है. विपक्ष से जुड़ी मीडिया वेबसाइट ईरान इंटरनेशनल ने दावा किया है कि देशभर में की गई सुरक्षा कार्रवाई के दौरान कम से कम 12,000 लोगों की जान गई. इस दावे को ईरान के आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी हिंसक कार्रवाई बताया गया है. हालांकि यह आंकड़ा सरकारी पक्ष और अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों से काफी अलग है, जिससे सच्चाई को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.
सरकारी दावों और स्वतंत्र अनुमानों में बड़ा अंतर
सुरक्षा बलों पर सुनियोजित कार्रवाई का आरोप
ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक हिंसा 8 और 9 जनवरी की रात को हुई. दावा किया गया कि इस दौरान इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) और बासिज बलों ने कई शहरों में एक साथ अभियान चलाया. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह हिंसा किसी अचानक हुई झड़प का नतीजा नहीं थी, बल्कि पहले से योजनाबद्ध और संगठित कार्रवाई थी.
शीर्ष नेतृत्व की भूमिका पर गंभीर आरोप
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह ऑपरेशन ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के सीधे आदेश पर किया गया. दावा है कि देश की राष्ट्रीय सर्वोच्च सुरक्षा परिषद ने जीवित गोलियों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी और इस फैसले की जानकारी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को थी. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है.
आंकड़े कहां से आए: रिपोर्ट की जांच प्रक्रिया
ईरान इंटरनेशनल का कहना है कि 12,000 मौतों का आंकड़ा ईरान की सुरक्षा एजेंसियों के आंतरिक रिकॉर्ड पर आधारित है. वेबसाइट ने दावा किया कि यह जानकारी कई स्तरों पर सत्यापित की गई है. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और राष्ट्रपति कार्यालय से जुड़े सूत्र, IRGC के भीतर के लोग, प्रत्यक्षदर्शी बयान, चिकित्सा अधिकारियों की गवाही और विभिन्न शहरों के अस्पतालों व क्लीनिकों से मिले आंकड़े शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इस डेटा को प्रकाशित करने से पहले कई चरणों में जांच की गई और सख्त पेशेवर मानकों का पालन किया गया. इसमें यह भी कहा गया कि मारे गए लोगों में बड़ी संख्या 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की थी.
सूचना ब्लैकआउट और देरी की वजह
वेबसाइट ने बताया कि रिपोर्ट के प्रकाशन में देरी इसलिए हुई क्योंकि उस दौरान देशभर में इंटरनेट बंदी, मीडिया पर रोक और संचार पर सख्त नियंत्रण लागू था. पत्रकारों और गवाहों को कथित तौर पर धमकाया गया, जिससे जानकारी जुटाना और उसकी पुष्टि करना और भी मुश्किल हो गया. रिपोर्ट का दावा है कि ये कदम केवल सुरक्षा कारणों से नहीं, बल्कि घटनाओं की गंभीरता को छिपाने के लिए भी उठाए गए.
सटीक आंकड़ों की चुनौती और चेतावनी
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब किसी देश में जानबूझकर सूचना तक पहुंच सीमित की जाती है, तो वास्तविक नुकसान का आकलन करने में समय लगता है. अधूरे या जल्दबाजी में जारी किए गए आंकड़े घटनाओं के पैमाने को कम करके दिखा सकते हैं. ईरान इंटरनेशनल का कहना है कि पर्याप्त साक्ष्य और एक जैसे बयानों के आधार पर ही यह अनुमान सार्वजनिक किया गया.
अलग-अलग शहरों से जुटाए गए सबूत
रिपोर्ट तैयार करने के दौरान मशहद, करमानशाह और इस्फ़हान जैसे शहरों से मिली जानकारियों को शामिल किया गया. इसके अलावा पीड़ित परिवारों और स्वास्थ्यकर्मियों की गवाही को भी जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया. वेबसाइट के संपादकीय बोर्ड का कहना है कि बहु-स्तरीय समीक्षा के बाद ही रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया गया.
ऐतिहासिक रूप से अभूतपूर्व हिंसा का दावा
ईरान इंटरनेशनल ने निष्कर्ष निकाला कि जिस पैमाने पर, जिस तीव्रता से और इतने कम समय में मौतें हुईं, वह ईरान के समकालीन इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया. रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश पीड़ितों को समन्वित अभियानों के दौरान IRGC और बासिज बलों ने गोली मारी. हालांकि यह भी स्वीकार किया गया कि अंतिम मृतक संख्या की पूरी पुष्टि के लिए और दस्तावेज़ों की आवश्यकता होगी, खासकर तब जब संचार प्रतिबंध अभी भी जारी हैं.
“सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता”
रिपोर्ट के अंत में वेबसाइट ने कहा कि ईरान के लोगों को दुनिया से काटकर इस तरह की घटनाओं को हमेशा के लिए छिपाया नहीं जा सकता. उसके अनुसार, समय के साथ सच्चाई सामने आएगी और मारे गए लोगों के नाम इतिहास में दर्ज होंगे, चाहे उन्हें कितनी भी चुप्पी में दफनाने की कोशिश क्यों न की जाए.


