जंग रुकी, लेकिन दर्द नहीं! टेंटों में इफ्तारी, लालटेन जलाकर रोशनी की उम्मीद...कुछ इस तरह गाजा में मनाया गया रमजान

रमजान का महीना शुरू हो गया है. गाजा में युद्ध विराम के बाद कुछ अलग तरीके से इस रमजान महीने की शुरुआत की गई है.बच्चों के चेहरों पर थोड़ी खुशी और राहत दिख रही है, क्योंकि अब कई महीनों बाद शांति का माहौल है.

Sonee Srivastav

Ramadan 2026: रमजान का महीना गाजा के लोगों के लिए नई उम्मीद की किरण लेकर आया है. अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम के बाद यह उनका पहला रमजान है. मलबे और ढह चुकी इमारतों के बीच सड़कों पर छोटी-छोटी लालटेन और रोशनी की मालाएं सजाई गई हैं. बच्चों के चेहरों पर थोड़ी खुशी और राहत दिख रही है, क्योंकि अब कई महीनों बाद शांति का माहौल है. लोग रोजा रख रहे हैं और इफ्तार कर रहे हैं, लेकिन दर्द और कमी अभी भी बाकी है. 

ओमारी मस्जिद में नमाज

रमजान की पहली सुबह ओमारी मस्जिद में दर्जनों लोग फज्र की नमाज अदा करने पहुंचे. सर्दी के कारण भारी जैकेट पहने थे, लेकिन पैर नंगे थे. गाजा सिटी के निवासी अबू आदम ने बताया कि मस्जिदों, स्कूलों और घरों की तबाही के बावजूद वे इबादत के लिए आए. उन्होंने कहा कि पिछली रात भी इलाके पर हमला हुआ था, लेकिन अल्लाह की इबादत का इरादा नहीं डगमगाया.

टेंटों में रह रहे लोग 

युद्धविराम के बाद भी गाजा के दक्षिण में हजारों लोग टेंट और अस्थायी शेल्टर में रह रहे हैं. अल-मवासी इलाके में रहने वाली 50 वर्षीय निविन अहमद ने कहा कि यह पहला रमजान बिना जंग के है, लेकिन एहसास मिले-जुले हैं. पहले इफ्तार की मेज पर ढेर सारे व्यंजन होते थे और पूरा परिवार साथ होता था. 

अब मुश्किल से एक मुख्य और एक साइड डिश बन पाती है. सब कुछ बहुत महंगा है. वे शहीद हुए लोगों, लापता सदस्यों और हिरासत में गए रिश्तेदारों को याद करती हैं. खुशी दब गई है.

सजावट और एकजुटता की उम्मीद

37 वर्षीय महा फाठी गाजा सिटी से विस्थापित होकर पश्चिमी हिस्से में तंबू में रहती हैं. उन्होंने कहा कि इतनी तबाही और दुख के बीच भी रमजान खास है. युद्ध के दौरान लोग अकेले थे, लेकिन अब एक-दूसरे के दुख समझ रहे हैं. परिवार और पड़ोसी सहरी बनाते समय और रमजान की सजावट करते हुए छोटी-छोटी खुशियां साझा कर रहे हैं. सजावट और बाजारों की हलचल देखकर स्थिरता की वापसी की उम्मीद जागती है.

समुद्र तट पर रमजान का स्वागत

मध्य गाजा के देर अल-बलाह समुद्र तट पर फिलिस्तीनी कलाकार यजीद अबू जराद ने रेत पर अरबी में सुंदर तरीके से “वेलकम रमजान” लिखा. पास के तंबू शिविर के बच्चे इसे देखकर खुश हो रहे थे. यह छोटा-सा प्रयास लोगों को रमजान का माहौल महसूस करा रहा है.

दो साल से ज्यादा चले युद्ध में गाजा के लगभग 22 लाख लोग एक बार से ज्यादा विस्थापित हुए. मदद के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर हैं, लेकिन सामान की कमी और ऊंची कीमतें बनी हुई हैं. 43 वर्षीय मोहम्मद अल-मधून ने कहा कि उम्मीद है यह आखिरी रमजान तंबू में बीतेगा. बच्चे लालटेन मांगते हैं और अच्छी इफ्तार की मेज का सपना देखते हैं, लेकिन वह खुद को बेबस महसूस करते हैं.

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