नेपाल में जेन-Z क्रांति के बाद 5 मार्च को मतदान, राजनीति में ओल्ड गार्ड पूरी तरह एक्टिव...लेकिन, जनता को बदलाव की बड़ी उम्मीद
नेपाल में भ्रष्टाचार, खराब शासन और पुराने नेताओं से तंग आकर सितंबर 2025 में Gen Z ने एक आंदोलन किया था . जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी थी. युवा सड़कों पर उतर आए थे. जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया था. वहीं अब जेन-Z की क्रांति के बाद 5 मार्च को मतदान होने जा रहा है. इस चुनाव में 35 साल के बालेन्द्र शाह, 49 साल के गगन थापा और 74 साल के केपी शर्मा ओली के बीच टक्कर देखने को मिल रहा है.

नई दिल्ली : नेपाल एक बार फिर ऐतिहासिक बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है. लंबे समय से सत्ता पर काबिज़ पुराने नेताओं और उभरती युवा पीढ़ी के बीच टकराव अब खुलकर चुनावी मैदान में दिखाई दे रहा है. सितंबर 2025 में हुए Gen Z आंदोलन ने देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल दी. भ्रष्टाचार, कमजोर प्रशासन और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ सड़कों पर उतरी युवा पीढ़ी ने यह साफ कर दिया कि अब वे केवल दर्शक बने रहने को तैयार नहीं हैं.
Gen Z आंदोलन से चुनाव तक का सफर
इसके बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, संसद भंग हुई और नए आम चुनाव की घोषणा की गई. अब 5 मार्च को नेपाल की जनता यह तय करेगी कि वह पुराने नेतृत्व पर भरोसा जताती है या नई पीढ़ी को सत्ता सौंपती है.
बालेन शाह: आंदोलन से सत्ता की दावेदारी तक
Gen Z आंदोलन के दौरान काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह, जिन्हें बालेन के नाम से जाना जाता है, युवाओं की आवाज़ के प्रतीक बनकर उभरे. रैपर से नेता बने बालेन ने प्रशासनिक सख़्ती और साफ़ बोलने की शैली से पहले ही राष्ट्रीय पहचान बना ली थी. आंदोलन के बाद जब युवाओं ने उनसे केयरटेकर प्रधानमंत्री बनने की अपील की, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वे बैकडोर से नहीं, बल्कि जनादेश के ज़रिये पूरी अवधि के लिए सत्ता में आना चाहते हैं.
इसी सोच के तहत बालेन ने मेयर पद से इस्तीफा दिया और रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का दामन थाम लिया. पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है.
झापा-5: जहां से तय होगा नेपाल का भविष्य
बालेन शाह ने पूर्वी नेपाल के झापा-5 निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला किया है. यह वही सीट है जहां से केपी शर्मा ओली लगातार जीतते आए हैं. इस वजह से झापा-5 अब सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे देश की निगाहों का केंद्र बन चुका है. यहां का जनादेश यह संकेत देगा कि नेपाल बदलाव की ओर बढ़ रहा है या यथास्थिति को ही चुनेगा.
ओली बनाम बालेन: अनुभव बनाम बदलाव
74 वर्षीय केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति का सबसे अनुभवी और विवादित चेहरा रहे हैं. वे चार बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं और पिछले तीन दशकों में झापा जिले से छह बार सांसद चुने जा चुके हैं. वहीं 35 वर्षीय बालेन शाह उनके ठीक उलट हैं युवा, आक्रामक और सिस्टम को चुनौती देने वाले नेता.
Gen Z युवाओं का गुस्सा खासतौर पर ओली पर इसलिए भी है क्योंकि आंदोलन को कुचलने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप उन्हीं पर लगा. यही कारण है कि यह चुनाव ओली के लिए सिर्फ एक और मुकाबला नहीं, बल्कि उनके लंबे राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है.
नेपाली कांग्रेस का दांव: गगन थापा
इस चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाते हुए नेपाली कांग्रेस ने 49 वर्षीय गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है. हाल ही में पार्टी अध्यक्ष चुने गए गगन थापा को एक आधुनिक सोच वाले और सुधारवादी नेता के रूप में देखा जाता है. पार्टी नेतृत्व का मानना है कि वे युवा मतदाताओं और परंपरागत कांग्रेस समर्थकों के बीच सेतु का काम कर सकते हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गगन थापा का उभार चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है, क्योंकि वे न तो पूरी तरह ‘ओल्ड गार्ड’ हैं और न ही पूरी तरह आंदोलनकारी धड़े से जुड़े हुए.
युवाओं का गुस्सा और सत्ता की कसौटी
Gen Z आंदोलन में जान गंवाने वाले 77 युवाओं की याद अब भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है. युवाओं का साफ कहना है कि अगर वही नेता दोबारा सत्ता में लौटते हैं, जिन्हें वे इस हिंसा के लिए जिम्मेदार मानते हैं, तो आंदोलन की नैतिक जीत पर सवाल उठेंगे. दूसरी ओर, अगर नया नेतृत्व जीतता है, तो यह नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव की शुरुआत होगी.
नेपाल के लिए यह चुनाव क्यों ऐतिहासिक है
यह चुनाव सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि नेपाल किस दिशा में जाएगा. एक तरफ़ दशकों का अनुभव और सत्ता की पकड़ है, तो दूसरी ओर बदलाव, पारदर्शिता और नई राजनीति का वादा. “पुराना बनाम नया” की यह लड़ाई नेपाल के लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. अब फैसला 5 मार्च को जनता के हाथ में है और यही फैसला आने वाले वर्षों तक नेपाल की राजनीति की तस्वीर तय करेगा.


