UN में ईरान के समर्थन में साथ आए भारत-चीन-पाकिस्तान, इस प्रस्ताव पर ‘NO’ वोट देकर सबको चौंका
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पर भारत ने ‘NO’ वोट देकर सबको चौंका दिया. भारत का यह कदम उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और पश्चिमी दबाव से दूरी का संकेत माना जा रहा है.

नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में हुए एक अहम घटनाक्रम ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. 39वें विशेष सत्र के दौरान जब ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों ने निंदा प्रस्ताव पेश किया, तब भारत ने सबको हैरान करते हुए उसका खुला विरोध किया. आमतौर पर संतुलित और तटस्थ रुख अपनाने वाला भारत इस बार सीधे ‘NO’ वोट के साथ ईरान के समर्थन में खड़ा नजर आया, जिससे अमेरिका और यूरोपीय देशों की रणनीति को बड़ा झटका लगा.
यह मतदान प्रस्ताव संख्या A/HRC/S-39/L.1 पर हुआ. इस प्रस्ताव का लक्ष्य 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति' की निंदा करना था. खासतौर पर दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुए देशव्यापी प्रदर्शनों का हवाला देते हुए पश्चिमी देशों ने ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की कोशिश की. प्रस्ताव का मकसद संयुक्त राष्ट्र के मंच से ईरान की आलोचना करना और उस पर सख्त रुख अपनाने का रास्ता खोलना था.
क्या कहते हैं मतदान के नतीजे
वोटिंग के दौरान परिषद का माहौल काफी तनावपूर्ण रहा. नतीजों ने साफ कर दिया कि दुनिया इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटी हुई है. कुल 25 देशों ने प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया, जबकि 14 देशों ने खुद को मतदान से अलग रखा. इसके खिलाफ सिर्फ 7 देशों ने वोट डाले, जिनमें भारत भी शामिल था. भले ही प्रस्ताव बहुमत से पास हो गया, लेकिन विरोध में आए देशों के नामों ने इसकी अहमियत को कम कर दिया.
भारत का बदला हुआ रुख
भारत का ‘NO’ वोट देना इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि वह आम तौर पर ऐसे प्रस्तावों पर तटस्थ रहने को प्राथमिकता देता है. इस बार भारत ने साफ संकेत दिया कि वह किसी भी देश के आंतरिक मामलों में दखल देने वाली कोशिशों का समर्थन नहीं करेगा. भारत के इस फैसले को उसकी स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक सोच का हिस्सा माना जा रहा है.
वहीं, भारत के साथ जिन देशों ने प्रस्ताव का विरोध किया, उनमें चीन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, इराक, वियतनाम और क्यूबा शामिल रहे. यह एक दुर्लभ स्थिति थी, जब भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे देश एक ही मुद्दे पर एक जैसी राय रखते नजर आए. इससे यह भी साफ हुआ कि एशियाई और विकासशील देश पश्चिमी एजेंडे से दूरी बना रहे हैं.
पश्चिमी देशों की रणनीति
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए पूरी ताकत झोंकी थी. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने इसके पक्ष में मतदान किया. उनका मानना था कि ईरान पर दबाव बनाना जरूरी है, लेकिन कई देशों ने इसे दोहरे मापदंड की नीति करार दिया.
तटस्थ रहने वाले देश
ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, कतर, कुवैत, मलेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों ने न तो समर्थन किया और न ही विरोध. इन देशों का मानना था कि ऐसे मामलों में संवाद और कूटनीति ज्यादा असरदार हो सकती है.
भारत के फैसले के मायने
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का यह कदम ईरान के साथ उसके पुराने संबंधों, ऊर्जा जरूरतों और चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाओं से जुड़ा है. साथ ही यह पश्चिमी देशों को यह संदेश भी देता है कि भारत अपने फैसले खुद करता है और दबाव में नहीं आता. हालांकि प्रस्ताव पारित हो गया, लेकिन भारत जैसे बड़े देश का खुला विरोध इस बात का संकेत है कि वैश्विक राजनीति में अब एकतरफा फैसले आसान नहीं रहे.


