अमेरिका का बढ़ता दबाव और युद्धपोतों की तैनाती, फिर भी क्यों टकराव के रास्ते पर अड़ा ईरान

मध्य पूर्व में तनाव फिर बढ़ रहा है। अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा रहा है। ईरान झुकने को तैयार नहीं दिखता। सवाल है, आखिर तेहरान समझौते के बजाय टकराव का जोखिम क्यों उठा सकता है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

अमेरिका की शर्तें ईरान के लिए साधारण नहीं हैं। यूरेनियम संवर्धन रोकना सबसे बड़ी मांग है। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम सीमित करने का दबाव भी है। क्षेत्रीय समूहों को समर्थन खत्म करने की बात भी शामिल है। तेहरान इसे सुरक्षा ढांचे पर हमला मानता है। ईरानी नेतृत्व को डर है कि इससे उसकी ताकत कमजोर होगी। इसलिए समझौता उसे आत्मसमर्पण जैसा लगता है। इसी कारण सार्वजनिक बयान सख्त होते जा रहे हैं। वार्ता में नरमी की गुंजाइश घटती दिखती है। सत्ता प्रतिष्ठान इस मुद्दे को अस्तित्व से जोड़कर देखता है। इसलिए समझौता राजनीतिक जोखिम भी बन सकता है।

क्या सैन्य जमावड़ा डर बढ़ा रहा है?

खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य तैनाती तेज हुई है। युद्धपोत और विमानवाहक पोत भेजे जा रहे हैं। यह दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है। लेकिन इसे युद्ध तैयारी का संकेत भी माना जा रहा है। इससे बातचीत मुश्किल हो जाती है। दोनों देशों में अविश्वास बढ़ता है। परिणामस्वरूप टकराव की आशंका गहराती दिखती है। क्षेत्रीय देश भी सतर्क हो गए हैं। समुद्री रास्तों की सुरक्षा चिंता बनी हुई है। सैन्य अभ्यास से संदेश और तीखे हो रहे हैं। माहौल कूटनीति से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन का लगने लगा है।

क्या ‘प्रतिरोध की धुरी’ ईरान की ताकत है?

ईरान वर्षों से ‘प्रतिरोध की धुरी’ पर काम कर रहा है। यह सहयोगी समूहों का नेटवर्क है। इसका मकसद टकराव को सीमाओं से दूर रखना है। साथ ही विरोधियों पर दबाव बनाए रखना है। ईरान इसे अपनी रक्षा रणनीति मानता है। इसे खत्म करना उसकी क्षेत्रीय पकड़ कमजोर कर सकता है। यही कारण है कि तेहरान पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। इस नेटवर्क से राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ता है। रणनीतिक गहराई बनाने में मदद मिलती है। विरोधियों के लिए जोखिम का दायरा बढ़ जाता है। इसलिए इसे छोड़ना आसान फैसला नहीं माना जाता।

क्या परमाणु क्षमता रणनीतिक हथियार है?

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बताता है। लेकिन इसे प्रतिरोध क्षमता का आधार माना जाता है। यूरेनियम संवर्धन तकनीकी ताकत का प्रतीक है। यह भविष्य में सैन्य विकल्प का संकेत भी देता है। विशेषज्ञ इसे “थ्रेशहोल्ड क्षमता” कहते हैं। यानी जरूरत पड़ने पर दिशा बदली जा सकती है। इसलिए ईरान इस पर नियंत्रण छोड़ना नहीं चाहता। परमाणु ढांचा राष्ट्रीय गौरव से भी जुड़ा है। वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में इसे प्रचारित किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद कार्यक्रम जारी है। इससे वार्ता और जटिल बनती जाती है।

क्या घरेलू राजनीति फैसलों को प्रभावित कर रही है?

ईरान के भीतर हालात भी चुनौतीपूर्ण हैं। आर्थिक दबाव और विरोध प्रदर्शन बढ़े हैं। सरकार की साख दांव पर है। ऐसे समय झुकना कमजोरी का संकेत माना जा सकता है। नेतृत्व अपनी छवि मजबूत रखना चाहता है। बाहर सख्ती दिखाना अंदर स्थिरता का संदेश देता है। यही राजनीति फैसलों को प्रभावित कर सकती है। जनता में असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आर्थिक मुश्किलें दबाव बढ़ाती हैं। सत्ता प्रतिष्ठान नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। इसलिए विदेश नीति भी घरेलू संतुलन से जुड़ी दिखती है।

क्या युद्ध अमेरिका के लिए भी जोखिम भरा है?

अमेरिका के लिए भी युद्ध आसान नहीं होगा। संघर्ष का परिणाम अनुमान से अलग हो सकता है। क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ईरान में सत्ता संकट नई जटिलताएं पैदा कर सकता है। इससे कट्टर ताकतें मजबूत हो सकती हैं। इसलिए वॉशिंगटन भी सावधानी से कदम बढ़ा रहा है। लंबे युद्ध का खर्च भारी होगा। सहयोगी देशों पर असर पड़ सकता है। सैन्य सफलता राजनीतिक समाधान नहीं देती। इसलिए जोखिम दोनों पक्षों के लिए मौजूद है।

क्या सीमित युद्ध कम बुरा विकल्प माना जा रहा है?

ईरानी नेतृत्व के सामने विकल्प सीमित हैं। शर्तें मानना रणनीतिक हार माना जा सकता है। ठुकराना संघर्ष का खतरा बढ़ाता है। लेकिन तेहरान सीमित युद्ध को कम बुरा विकल्प मान सकता है। इससे प्रतिरोध की छवि बची रहती है। साथ ही आंतरिक संदेश भी मजबूत जाता है। फिलहाल सार्वजनिक रुख इसी दिशा का संकेत देता है। नियंत्रित टकराव की सोच उभरती दिखती है। नेतृत्व इसे सहने योग्य जोखिम मान सकता है। राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाने का दबाव भी है। इसलिए बयानबाजी में सख्ती जारी है।

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