तेहरान पर बढ़ा दबाव, एक्सपर्ट बोले जंग में टूट रही ईरान की ताकत धीरे-धीरे
ईरान जंग के बीच बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका-इजरायल मिशन फेल हो गया। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध में तेहरान की सैन्य ताकत लगातार कमजोर होती जा रही है।

अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था।उस वक्त कई बड़े लक्ष्य बताए गए थे। इनमें सत्ता परिवर्तन की बात भी कही गई थी। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह मिशन फेल हो गया। क्योंकि तेहरान में सरकार अब भी कायम है। कई जगहों पर ईरान ने जवाबी हमले भी किए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तस्वीर इतनी सीधी नहीं है।
क्या विशेषज्ञ कुछ और कह रहे?
दोहा में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा के प्रोफेसर मुहानद सेलम ने अलग तस्वीर पेश की है। उनका कहना है कि अमेरिका और इजरायल पूरी तरह नाकाम नहीं हुए हैं। भले ही सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ हो। लेकिन ईरान की सैन्य ताकत पर लगातार चोट की जा रही है। सेलम ने अपने विश्लेषण में कहा है कि कई अहम ढांचे को नुकसान पहुंचा है। और यह नुकसान आने वाले समय में और बड़ा असर दिखा सकता है।
क्या हथियारों का जखीरा घट रहा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का वर्षों में तैयार किया गया हथियार भंडार अब तेजी से खत्म हो रहा है। उसके बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम को निशाना बनाया गया है। कई लॉन्च साइट और सैन्य ठिकाने प्रभावित हुए हैं। नौसेना के तेज हमलावर जहाजों को भी नुकसान हुआ है। छोटी पनडुब्बियों और माइन बिछाने वाली क्षमता को भी कमजोर किया गया है।यानी समुद्र और जमीन दोनों मोर्चों पर दबाव बढ़ रहा है।
क्या एयर डिफेंस भी कमजोर?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम दबाव में आ चुका है। अगर अमेरिका नॉन-स्टील्थ B-1 बॉम्बर ईरानी आसमान में उड़ा रहा है तो इसका मतलब साफ है।इसका मतलब है कि हवाई सुरक्षा कमजोर हुई है। युद्ध के पहले चरण में ईरान के कमांड और कंट्रोल सिस्टम पर हमला किया गया। उसके कई रडार और एयर डिफेंस ढांचे को निशाना बनाया गया। इससे ईरान की हवाई सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ा।
क्या दो चरणों में चल रहा युद्ध?
विश्लेषकों के अनुसार यह युद्ध दो चरणों में चल रहा है। पहले चरण में एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम को कमजोर किया गया। मिसाइल और ड्रोन लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बनाया गया। इसके बाद दूसरा चरण शुरू हुआ। अब ध्यान रक्षा उद्योग पर है।मिसाइल फैक्ट्री और रिसर्च सेंटर को टारगेट किया जा रहा है। ताकि भविष्य में हथियार बनाना मुश्किल हो जाए।
क्या ईरान रणनीतिक दुविधा में?
युद्ध के इस दौर में ईरान एक बड़ी रणनीतिक दुविधा में फंस गया है। अगर वह अपनी बची हुई मिसाइलें दागता है तो उसके लॉन्चर सामने आ जाते हैं। और फिर तुरंत हमले का निशाना बनते हैं। अगर वह मिसाइल बचाकर रखता है तो जवाबी हमले की ताकत घट जाती है। यानी हर फैसला जोखिम से भरा है। इसी वजह से कई हमले सीमित स्तर पर हो रहे हैं।
क्या तेहरान की ताकत टूट रही?
विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। उसके कई सैन्य ढांचे को झटका लगा है। मिसाइल नेटवर्क, एयर डिफेंस और नौसेना की क्षमता प्रभावित हुई है।प्रॉक्सी कमांड नेटवर्क भी दबाव में बताया जा रहा है। युद्ध के सत्रह दिन बाद तस्वीर साफ हो रही है। कई विश्लेषक मानते हैं कि तेहरान की ताकत धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। और यही इस युद्ध की असली रणनीति मानी जा रही है।


