हिजबुल्ला को भारी झटका! इजरायल-लेबनान में अचानक सीजफायर, पीछे हटने की शर्तें आईं सामने
इजरायल और लेबनान ने अमेरिकी मध्यस्थता में सीजफायर पर सहमति जताई है. जिसमें हिजबुल्ला को लिटानी नदी के दक्षिण से हटना होगा और सुरक्षा क्षेत्रों में उसकी कोई गतिविधि नहीं होगी.

नई दिल्ली: इजरायल और लेबनान के बीच मंगलवार को युद्धविराम को फिर से लागू करने पर सहमति बन गई है. अमेरिका की मध्यस्थता में हुई चौथे दौर की बातचीत के बाद दोनों देश इस समझौते पर पहुंचे. इस समझौते का मकसद लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना है.
समझौते के तहत लेबनान में कुछ खास सुरक्षा क्षेत्र बनाए जाएंगे. इन क्षेत्रों से हिजबुल्ला के आतंकवादियों और उनके हथियारों को पूरी तरह हटाना होगा. इन इलाकों पर लेबनानी सेना का पूरा नियंत्रण रहेगा. हिजबुल्ला इन क्षेत्रों में कोई भी गतिविधि नहीं कर सकेगा.
समझौते की कुछ मुख्य शर्तें
- हिजबुल्ला को सभी तरह की गोलीबारी पूरी तरह बंद करनी होगी.
- लिटानी नदी के दक्षिण वाले पूरे इलाके से इजरायल के सैनिक और हथियार वापस ले लिए जाएंगे.
- सुरक्षा क्षेत्रों का पूरा नियंत्रण लेबनानी सेना के हाथ में होगा.
- इन क्षेत्रों में हिजबुल्ला की कोई भी सैन्य या अन्य गतिविधि पर सख्त पाबंदी रहेगी.
दोनों पक्षों ने अमेरिकी विदेश विभाग में जारी संयुक्त बयान में कहा कि यह कदम व्यापक शांति और सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम है.
ईरान को साफ संदेश
बयान में साफ कहा गया है कि इजरायल और लेबनान के बीच भविष्य के संबंध केवल उनकी अपनी संप्रभु सरकारें तय करेंगी. किसी भी दूसरे देश या गैर-सरकारी समूह को लेबनान के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने दिया जाएगा. यह बात साफ तौर पर ईरान की ओर इशारा करती है, जो हिजबुल्ला का मुख्य समर्थक माना जाता है.
हिजबुल्ला वार्ता में शामिल नहीं
ध्यान देने वाली बात यह है कि हिजबुल्ला इस पूरी वार्ता में शामिल नहीं था. सुरक्षा क्षेत्रों को लागू करने की विस्तृत योजना अभी सार्वजनिक नहीं की गई है. लेबनानी सेना इन क्षेत्रों में शांति और नियंत्रण बनाए रखने की जिम्मेदारी संभालेगी. ऐसा मानना है कि यह समझौता पिछले कई महीनों के तनाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण है. हालांकि, समझौते की सफलता हिजबुल्ला के रवैये और ईरान के रुख पर निर्भर करेगी.
अगर दोनों पक्ष शर्तों का सख्ती से पालन करते हैं तो क्षेत्र में स्थायी शांति की उम्मीद बढ़ सकती है. यह समझौता फिलहाल शुरुआती कदम है, लेकिन सही तरीके से लागू होने पर दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है.


