बच गए खामेनेई...इस शख्स की वजह से ईरान पर चाहकर भी हमला नहीं कर पाया अमेरिका, जानें कौन हैं अली लारीजानी ?

ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन के बीच के एक राहत की खबर सामने आई है. फिलहाल अमेरिका ईरान पर हमला नहीं करेगा. कतर, सऊदी और ओमान की सिफारिश के बाद अमेरिका ने हमला न करने का निर्णय लिया है. इस बीच एक नाम की खूब चर्चा हो रही है वो नाम है लारीजानी का. हालांकि, अब अमेरिका ने लारीजानी पर प्रतिबंध लगा दिया है.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच फिलहाल ईरान को बड़ी राहत मिली है. अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई का इरादा टाल दिया है और बातचीत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. सऊदी अरब, कतर और ओमान की पहल के बाद अमेरिका ने यह रुख अपनाया है. इसे अयातुल्लाह अली खामेनेई की सरकार के लिए एक अहम कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है.

तेहरान में जिस नाम की सबसे ज्यादा चर्चा, वह हैं अली लारीजानी

आपको बता दें कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान ईरान की सत्ता के गलियारों में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, वह है अली लारीजानी. अमेरिका ने शुक्रवार को लारीजानी पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया. लारीजानी वर्तमान में ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख हैं और माना जा रहा है कि उनकी रणनीति और कूटनीति ने ही अमेरिका को सीधे हमले से पीछे हटने पर मजबूर किया.

सर्वोच्च परिषद के प्रमुख बनते ही बदली ईरान की रणनीति
अगस्त 2025 में अली लारीजानी को ईरान की सर्वोच्च सुरक्षा परिषद का सचिव नियुक्त किया गया था. इस पद पर आते ही उन्होंने देश की सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करना शुरू किया. माना जाता है कि लारीजानी के नेतृत्व में ईरान ने ऐसी रणनीतिक घेराबंदी की, जिसके चलते अमेरिका के लिए सैन्य हमला आसान नहीं रह गया.

अली लारीजानी का राजनीतिक सफर
अली लारीजानी का जन्म 3 जून 1958 को एक प्रभावशाली शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था. उनके पास डॉक्टरेट की डिग्री है और वे लंबे समय से ईरान की सत्ता संरचना का अहम हिस्सा रहे हैं. वर्ष 2004 में वे पहली बार सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की कोर टीम में शामिल हुए, जहां उन्हें सलाहकार की भूमिका दी गई. वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के सदस्य भी रह चुके हैं और अपने करियर की शुरुआत उन्होंने गार्ड्स में कमांडर के तौर पर की थी.

मीडिया से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक का सफर
1994 में लारीजानी को ईरान के सरकारी प्रसारक इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान ब्रॉडकास्टिंग का प्रमुख बनाया गया. इसके बाद 2005 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भी किस्मत आजमाई, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. उन्हें ईरान की कट्टरपंथी राजनीति का मजबूत चेहरा माना जाता है. 2024 के चुनाव में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था, लेकिन खामेनेई के करीबी होने के कारण उनका प्रभाव कम नहीं हुआ.

क्षेत्रीय कूटनीति में लारीजानी की निर्णायक भूमिका
सुरक्षा परिषद के प्रमुख बनने के बाद लारीजानी ने ईरान के पारंपरिक विरोधियों से संवाद की रणनीति अपनाई. उन्होंने सबसे पहले सऊदी अरब से संपर्क साधा और बीते छह महीनों में सऊदी नेतृत्व से कम से कम तीन बार मुलाकात की. सितंबर 2025 में उनकी सऊदी क्राउन प्रिंस से हुई बैठक को बेहद अहम माना गया. इसके अलावा उन्होंने इराक, लेबनान और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों का भी दौरा किया.

अरब देशों ने अमेरिका को हमले से रोका
लारीजानी की कूटनीतिक सक्रियता का असर यह हुआ कि सऊदी अरब के नेतृत्व में कतर और ओमान ने अमेरिका को यह समझाने की कोशिश की कि ईरान पर हमला पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी साबित होगा. इन देशों की पहल पर ईरान से बातचीत का रास्ता खुला, जिसके बाद अमेरिका ने अपने रुख में बदलाव किया.

आंतरिक अशांति के दौरान खुद संभाली कमान
ईरान में जब विरोध प्रदर्शन उग्र होने लगे और हालात विद्रोह जैसे बन गए, तब लारीजानी खुद सामने आए. उन्होंने सेना में बड़े प्रशासनिक बदलाव किए और अहम पदों पर भरोसेमंद अधिकारियों की नियुक्ति की. संकट के समय वे खुद टीवी इंटरव्यू में नजर आए और उन्होंने इन प्रदर्शनों को अमेरिका और इजराइल से जोड़ते हुए विदेशी साजिश करार दिया.

अमेरिका का बैन और रणनीतिक असमंजस
अमेरिका द्वारा लारीजानी पर प्रतिबंध ऐसे समय में लगाया गया है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले को फिलहाल रोकने का फैसला किया है. अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस बात को लेकर सहमति नहीं बन सकी कि सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव होगा या नहीं. सुरक्षा बैठकों में यह चिंता भी जताई गई कि अगर हमला निर्णायक नहीं हुआ तो अमेरिका को लंबी जंग में फंसना पड़ सकता है.

तनाव के बीच बातचीत का रास्ता खुला
फिलहाल ईरान और अमेरिका के बीच सीधी टकराव की आशंका टल गई है, लेकिन हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हैं. अली लारीजानी की रणनीति ने ईरान को समय और कूटनीतिक बढ़त जरूर दिलाई है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह संवाद तनाव कम करता है या सिर्फ एक अस्थायी विराम साबित होता है.

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