बांग्लादेश में लड़की बहिन, आयुष्मान भारत? बांग्लादेश के घोषणापत्र में भारतीय योजनाओं की झलक
भारत में ये योजनाएं चुनावी हथियार साबित हुईं. बांग्लादेश में महिलाएं मतदाताओं में ज्यादा हैं, इसलिए ये वादे गेम-चेंजर बन सकते हैं. अशांति के बाद वोटरों का भरोसा जीतने की कोशिश है. लेकिन क्या ये वादे अमल होंगे? 12 फरवरी का रिजल्ट बताएगा कि 'फ्रीबीज' राजनीति का असर सीमा पार कितना मजबूत है.

नई दिल्लीः भारत की कल्याणकारी योजनाओं का असर अब पड़ोसी बांग्लादेश की राजनीति पर भी दिखाई दे रहा है. वहां की प्रमुख पार्टियां भारत की महिला-केंद्रित और गरीब-समर्थक स्कीमों से प्रेरित होकर अपने चुनावी वादे तैयार कर रही हैं. बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल अब नकद मदद, सस्ते घर और स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे भारत में आयुष्मान भारत और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं ने वोटरों का दिल जीता है.
बांग्लादेश में चुनावी माहौल गरम
12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में आम चुनाव होने जा रहे हैं. यह देश के इतिहास का एक अहम मोड़ है, क्योंकि अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार छात्र आंदोलन के बाद गिर गई थी. उसके बाद से राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और बदलाव की लहर चल रही है. बीएनपी (तारिक रहमान के नेतृत्व में) और जमात-ए-इस्लामी दोनों ही सत्ता की दावेदार बनकर उभर रही हैं. इन दोनों दलों के घोषणा-पत्रों में भारत की कई लोकप्रिय योजनाओं की छाप साफ दिखती है.
जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख वादे
जमात ने अपने घोषणा-पत्र में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का वादा किया है. गरीबों को चरणबद्ध तरीके से मुफ्त इलाज और उन्नत चिकित्सा उपलब्ध कराने की बात है. यह भारत की आयुष्मान भारत योजना से काफी मिलता-जुलता है, जहां हर परिवार को सालाना 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा मिलता है और मुख्य रूप से गरीब तबके को फायदा होता है. इसके अलावा, जमात ने निम्न और मध्यम वर्ग के लिए सस्ते आवास की योजना शुरू करने का संकल्प लिया है, जो भारत की प्रधानमंत्री आवास योजना की याद दिलाता है.
महिलाओं के मुद्दे पर भी जमात ने सरप्राइज दिया है. पार्टी ने वादा किया है कि सत्ता में आने पर कैबिनेट में महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या होगी. मातृत्व अवकाश के दौरान काम के घंटे घटाकर रोजाना पांच घंटे करने की बात भी कही गई है. हालांकि, जमात ने अभी तक कोई महिला उम्मीदवार नहीं उतारी है, जिससे राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं. पार्टी की पुरानी छवि को देखते हुए यह बदलाव काफी चर्चा में है.
बीएनपी के आकर्षक वादे
बीएनपी ने महिलाओं को सीधे निशाना बनाया है. तारिक रहमान ने 'फैमिली कार्ड' स्कीम का ऐलान किया है, जिसमें महिलाओं को हर महीने लगभग 2,000-2,500 टका (करीब 2,000 रुपये) की नकद मदद मिलेगी. साथ ही चावल, दाल, तेल और नमक जैसी जरूरी चीजें भी दी जाएँगी. शुरू में 50 लाख महिलाओं को कवर करने की योजना है, खासकर कम आय वाले परिवारों पर फोकस.
यह भारत की लाड़ली बहना योजना (मध्य प्रदेश) और लड़की बहन योजना (महाराष्ट्र) जैसी स्कीमों से प्रेरित लगता है, जहां महिलाओं को सीधी आर्थिक मदद से चुनावी फायदा मिला है. बीएनपी ने आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं के लिए सूक्ष्म वित्त योजना का भी वादा किया है, जिसमें कौशल प्रशिक्षण और आय बढ़ाने पर जोर होगा, भारत की महिला समृद्धि जैसा.
किसानों के लिए 'किसान कार्ड' लाने की बात है, जिसमें सस्ता ऋण, सब्सिडी और बीमा शामिल होगा, ठीक किसान क्रेडिट कार्ड की तरह.शिक्षा में बीएनपी ने भारत के मिड-डे मील प्रोग्राम से प्रेरणा ली है. स्कूलों में बच्चों को रोजाना ताजा पका भोजन देने का वादा किया गया है.
क्या ये वादे काम आएंगे?
भारत में ऐसी कल्याणकारी योजनाएं लंबे समय से चुनाव जीतने का हथियार रहीं हैं. अब बांग्लादेश में भी बीएनपी और जमात इन्हीं से प्रेरित होकर वोटरों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही हैं, खासकर महीनों की अशांति के बाद. महिलाएं मतदाता सूची में पुरुषों से ज्यादा हैं, इसलिए महिला-केंद्रित वादे दोनों दलों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये बड़े वादे हकीकत बन पाएंगे और वोटरों पर असर डाल पाएंगे? 12 फरवरी का नतीजा बताएगा कि भारत की 'फ्रीबीज' वाली राजनीति का जादू सीमा पार कितना चलता है.


