परमाणु परीक्षणों की कीमत: शांति के नाम पर हुई चुपचाप हत्याएं और कभी न मांगी गई माफी
परमाणु हथियारों के परीक्षणों ने बिना युद्ध के लाखों लोगों की जान ली। सवाल यह है कि इतनी मौतों के बाद भी ताकतवर देश माफी क्यों नहीं मांगते और सच क्यों छिपाते हैं।

परमाणु हथियारों को दुनिया सुरक्षा का कवच बताती रही। कहा गया कि ये हथियार डर पैदा कर जंग रोकते हैं। लेकिन सच्चाई इससे अलग निकली। रिपोर्ट बताती है कि परीक्षणों ने ही लाखों लोगों को मार डाला। ये मौतें किसी सीमा पर नहीं रुकीं। ये हवा, पानी और मिट्टी के साथ फैलीं। लोगों को पता भी नहीं चला। बीमारी सालों बाद सामने आई। कैंसर बढ़ा। दिल की बीमारियां बढ़ीं। बच्चों में जन्मजात समस्याएं दिखीं।
इतनी मौतों के बाद भी चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है। अगर 40 लाख लोग मरे हैं तो जिम्मेदारी कौन लेगा। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश खुद को लोकतंत्र का झंडाबरदार कहते हैं। लेकिन जब माफी की बात आती है तो ये पीछे हट जाते हैं। फाइलें आज भी बंद हैं। कई रिपोर्ट गोपनीय हैं। सच सामने आया तो अपराध मानना पड़ेगा। इसलिए चुप्पी ही सबसे सुरक्षित रास्ता चुना गया।
राज्य की नीति या मानवीय अपराध?
इन मौतों को अक्सर दुर्घटना कहा गया। कहा गया कि विज्ञान की कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन सवाल है कि क्या इंसानी जान इतनी सस्ती थी। अगर किसी और देश ने ऐसा किया होता तो उसे अपराध कहा जाता। यहां इसे नीति कहा गया। यह नीति थी जिसमें इंसान से ज्यादा हथियार अहम थे। यह नीति थी जिसमें पीढ़ियों का भविष्य दांव पर लगाया गया।
पीड़ितों को मुआवजा क्यों अधूरा रहा?
कुछ जगहों पर मुआवजा दिया गया। लेकिन वह नाकाफी था। कई परिवारों को बीमारी का कारण ही नहीं बताया गया। कहीं जमीन आज भी जहरीली है। कहीं लोग इलाज के लिए भटकते हैं। मुआवजा ऐसा था जैसे जिम्मेदारी से बचने का रास्ता। न सही इलाज मिला। न साफ माफी। न भविष्य की गारंटी।
महिलाएं और बच्चे क्यों बने आसान शिकार?
रेडिएशन का असर सब पर बराबर नहीं पड़ा। गर्भ में पल रहे बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। कई बच्चे बीमार पैदा हुए। महिलाओं में कैंसर का खतरा ज्यादा रहा। यह सब अचानक नहीं हुआ। यह धीरे धीरे हुआ। सालों तक चलता रहा। और सरकारें कहती रहीं कि सब सुरक्षित है।
आज भी खतरा खत्म क्यों नहीं हुआ?
यह कहानी अतीत की नहीं है। आज भी हर इंसान के शरीर में रेडिएशन के अंश हैं। यह रिपोर्ट यही बताती है। पुराने परीक्षणों का असर अब भी मौजूद है। जब आज फिर परमाणु परीक्षण की बातें होती हैं तो डर बढ़ता है। क्या दुनिया वही गलती दोहराने जा रही है। क्या फिर वही चुप्पी होगी।
माफी से डर क्यों लगता है ताकतवरों को?
माफी मांगना कमजोरी नहीं होता। लेकिन यहां माफी का मतलब अपराध स्वीकार करना है। यही डर है। अगर माफी मांगी गई तो इतिहास बदलेगा। किताबों में हीरो नहीं, दोषी लिखे जाएंगे। शायद इसलिए परमाणु ताकतें आज भी खामोश हैं। और यही खामोशी इस पूरी कहानी का सबसे खतरनाक हिस्सा है।


