पाकिस्तान में बच्चियों की शादी नहीं, दरअसल सत्ता की करवाई जा रही कट्टरपंथ से शादी
पाकिस्तान में बाल विवाह पर बहस अचानक तेज हो गई है। मामला धर्म का नहीं दिखता। असली टकराव सत्ता, कानून और कट्टर राजनीति के बीच नजर आ रहा है, जहां संविधान की परीक्षा हो रही है।

पाकिस्तान में 10 साल की बच्चियों की शादी का बयान समाज सुधार का विरोध नहीं है। यह सत्ता पर दबाव बनाने की रणनीति दिखती है। यहां धर्म को ढाल बनाया गया है। बयान संसद को चुनौती देता है। यह सीधे कानून की हैसियत पर सवाल उठाता है। सरकार की चुप्पी चिंता बढ़ाती है। मामला बच्चियों से आगे निकल चुका है।
किसे चुनौती दे रहे हैं मौलाना?
यह बयान किसी एक कानून के खिलाफ नहीं है। यह पूरे संवैधानिक ढांचे पर वार है। मौलाना फजलुर रहमान सरकार को नहीं ललकार रहे। वह संसद के अधिकार को नकार रहे हैं। संदेश साफ है कि कानून उनकी मर्जी से चले। धार्मिक भाषा में सियासी दबाव बनाया जा रहा है। यही असली टकराव है।
कानून बनाम सड़क की ताकत?
जब कानून बनता है तो सड़क से शोर उठता है। पाकिस्तान में यह नया नहीं है। महिलाओं और बच्चों से जुड़े कानून हमेशा विवाद में रहे। हर बार धर्म की दीवार खड़ी की गई। इससे सरकार पीछे हटती रही। नतीजा यह कि सुधार अधूरे रह गए। अब वही खेल दोहराया जा रहा है।
औरतों से डर क्यों लगता है?
इस पूरे विवाद की जड़ डर है। डर यह नहीं कि शादी रुकेगी। डर यह है कि औरतों को अधिकार मिलेंगे। घरेलू हिंसा कानून इसी डर को बढ़ाता है। बाल विवाह रोकथाम भी यही करता है। ये कानून औरत को इंसान मानते हैं। यही बात कट्टर सोच को चुभती है। इसलिए विरोध उग्र है।
सरकार की खामोशी क्या कहती?
शहबाज़ शरीफ सरकार इस वक्त परीक्षा में है। सवाल मौलाना बनाम सरकार का नहीं है। सवाल राज्य की ताकत का है। अगर सरकार झुकी तो संदेश जाएगा। संदेश यह कि दबाव से कानून बदले जा सकते हैं। इससे आगे और मांगें आएंगी। तब संभालना मुश्किल होगा।
धर्म या वोट बैंक की चाल?
मौलाना फजलुर रहमान जिस धार्मिक अधिकार की बात कर रहे हैं। वह असल में सियासी पूंजी है। बाल विवाह का ऐलान प्रतीक है। इसका मकसद सरकार को घेरना है। समर्थकों को भड़काना है। सत्ता सौदेबाजी की जमीन बनाना है। धर्म यहां सिर्फ मुखौटा है।
भविष्य का सबसे खतरनाक सवाल?
अगर बच्ची की शादी धार्मिक अधिकार है। तो उसकी चुप्पी क्या मर्जी मानी जाएगी। यही सवाल डराता है। यही सवाल समाज को तोड़ता है। कानून कमजोर पड़ा तो नुकसान गहरा होगा। यह बहस पाकिस्तान के भविष्य से जुड़ी है। फैसला अब राज्य को करना है।


