पीओके की सड़कों पर उठा तूफान, पाकिस्तान की पकड़ ढीली, जनता ने खुद उठाई आवाज़
पीओके में लोगों ने अब खुलकर पाकिस्तान को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है। बिजली, पानी, रोज़गार और इज़्ज़त की लड़ाई अब आंदोलन का रूप ले चुकी है।

New Delhi: पीओके में कई महीनों से आम लोग महंगाई, बिजली कटौती और पानी की कमी झेलते आ रहे थे। ऊपर से टैक्स और नियम इतने सख्त थे कि लोगों का जीना मुश्किल हो रहा था। जनता का कहना था कि हमारे नाम पर मिलने वाला पैसा इस्लामाबाद में खाया जाता है और हमारे घरों तक कुछ नहीं आता। धीरे-धीरे छोटे विरोध बड़े जुलूसों में बदल गए। ये कोई अचानक उठी भीड़ नहीं थी, बल्कि भूख, बेरोज़गारी और अपमान का जमा हुआ दर्द था। जब लोगों ने देखा कि कोई उनकी सुनने वाला नहीं है, तब सड़क ही आवाज़ का मंच बन गई।
पाकिस्तान का वादा क्यों टूटा?
पाकिस्तान ने पीओके को सालों पहले अच्छे जीवन का वादा किया था। लेकिन असल स्थिति में न नौकरी मिली, न अस्पताल ठीक चले, न शिक्षा सही मिली। लोग कहने लगे कि हमारे शहरों और गांवों में विकास का एक ईंट तक नहीं लगी है। नेताओं ने रैलियों में सपने दिखाए, लेकिन घरों में खाली बर्तन और खाली जेबें लगती रहीं। जनता को समझ में आने लगा कि उनके नाम पर सिर्फ भाषण हुए हैं। इस धोखे ने ही लोगों को ये कहने पर मजबूर किया कि अब बस, अब हम खामोश नहीं रहेंगे।
तिरंगा आखिर क्यों दिखाई दिया?
कुछ युवाओं ने पीओके की सड़कों पर तिरंगे की तस्वीरें उठाई। ये कोई राजनीतिक चाल नहीं थी, बल्कि इज़्ज़त की पुकार थी। उन्होंने कहा कि हम पहले इंसान हैं, और हमारा हक़ है कि हम सम्मान से जिएँ। यह कदम वहाँ के लोगों के दिल में चल रहे बदलाव का प्रतीक था। किसी ने ये नहीं कहा कि हम आज ही पाकिस्तान छोड़ देंगे। लेकिन यह साफ दिखा कि उम्मीद अब भारत की तरफ भी झुक रही है। जहाँ रोशनी होती है, नज़र वहीं जाती है।
फौज क्यों उतारी गई?
इस्लामाबाद को समझ में आ गया कि यह विरोध सिर्फ नारों का नहीं, पेट और भविष्य का है। इसे बंदूक या लाठी से नहीं दबाया जा सकता। इसलिए पीओके में सेना की तैनाती बढ़ा दी गई। कई इलाकों का इंटरनेट धीमा कर दिया गया, कुछ जगह मीडिया कवरेज रोक दी गई। लेकिन आवाज़ें और ज़्यादा तेज़ हो गईं। लोगों ने कहा कि डर हमें पहले भी दिखाया गया, अब हम थक गए हैं। जब जनता अपनी जमीन पर खड़ी हो जाए, ताकत भी उसका रास्ता नहीं रोक पाती।
क्या पीओके भारत की ओर बढ़ रहा है?
रैलियों में, चर्चाओं में, घरों में, दुकान पर—अब भारत का ज़िक्र एक विकल्प नहीं, एक उम्मीद की तरह हो रहा है। लोग भारत के विकास, सड़कें, स्कूल, रोजगार और प्रशासन का उदाहरण देने लगे। यह कोई राजनीतिक प्रचार नहीं था। यह आम आदमी की तुलना थी, जो अपनी आँखों से अंतर देख रहा है। सवाल पाकिस्तान से दूर होने का नहीं, बल्कि बेहतर जीवन के करीब जाने का है।
इतिहास किस मोड़ पर खड़ा है?
पहली बार पीओके के लोग अपने भविष्य पर खुलकर बोल रहे हैं। अब चर्चा जमीन की नहीं, जिंदगी की हो रही है। राजनीतिक फैसले कभी संसदों में होते थे, लेकिन अब जनता खुद रास्ता लिख रही है। यह दौर आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव तय कर सकता है। अब मसला सिर्फ सीमा का नहीं, सम्मान और अधिकार का है।
आने वाला कल कैसा होगा?
अगर लोगों की आवाज़ इसी तरह मजबूत रही, अगर आंदोलन का हौसला कम नहीं हुआ—तो पीओके का कल आज से बिल्कुल अलग हो सकता है। यह बदलाव किसी नेता ने नहीं लाया, लोगों ने खुद उठाया है। जब आवाज़ जनता की हो जाती है, तो राज भी जनता तय करती है। यह कहानी अभी खत्म नहीं-यह तो बस शुरुआत है।


