तालिबान में गुलामी की वापसी!...अपराध करने पर भी मौलवियों पर नहीं होगी कोई कार्रवाई, मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

तालिबान ने जनवरी 2026 में अफगानिस्तान में नया क्रिमिनल प्रोसीजर कोड लागू किया, जिसमें गुलामी को कानूनी मान्यता दी गई है. समाज को चार वर्गों में बांटना, मौलवियों को अपराध से छूट देना और गरीबों को सख्त सजा देना मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जा रहा है. यह कानून महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा रहा है.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन ने अपने नए कानूनी बदलावों से दुनिया भर को चौंका दिया है. जिस गुलामी प्रथा को अंतरराष्ट्रीय समुदाय सदियों पहले अमानवीय मानकर खत्म कर चुका है, उसे तालिबान ने अपने नए आपराधिक प्रक्रिया संहिता के जरिए दोबारा कानूनी मान्यता दे दी है. यह नया क्रिमिनल प्रोसीजर कोड जनवरी 2026 में तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा की मंजूरी के बाद लागू किया गया है और इसे अफगान अदालतों में लागू करने के आदेश भी दे दिए गए हैं.

कानून में “गुलाम” और “मालिक” जैसी शब्दावली

आपको बता दें कि इस नए दस्तावेज को लेकर सबसे बड़ा विवाद इसमें इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर है. कानून के कई हिस्सों में खुले तौर पर “गुलाम” और “मालिक” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि तालिबान गुलामी को एक वैध सामाजिक और कानूनी श्रेणी के रूप में स्वीकार कर रहा है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह बदलाव आधुनिक कानून और मानवीय मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है.

समाज को चार असमान वर्गों में बांटने का आरोप
मानवाधिकार संगठन ‘रवादारी’ के अनुसार, तालिबान का यह नया कोड अफगान समाज को चार अलग-अलग वर्गों में बांटता है. सबसे ऊपर उलेमा और मौलवी रखे गए हैं, जिन्हें अपराध करने पर सजा नहीं दी जाएगी, बल्कि केवल नसीहत दी जाएगी. इसके नीचे अशराफ और मध्यम वर्ग आते हैं, जबकि सबसे निचले पायदान पर गरीब और कथित “गुलाम” वर्ग को रखा गया है, जिन्हें जेल और शारीरिक दंड जैसी कठोर सज़ाएं झेलनी होंगी. यानी अब एक ही अपराध के लिए सज़ा व्यक्ति की सामाजिक हैसियत के आधार पर तय होगी.

मौलवियों को अपराध से छूट
इस कानून का एक और विवादास्पद पहलू यह है कि इसमें धार्मिक पद पर बैठे मुल्लाओं और मौलवियों को लगभग कानूनी छूट दी गई है. अगर कोई मौलवी अपराध करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने का प्रावधान नहीं रखा गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह न्याय व्यवस्था को पूरी तरह पक्षपाती और असमान बना देता है.

अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय गरिमा पर हमला
रवादारी और अन्य मानवाधिकार संगठनों ने कहा है कि यह कानून समाज को “आज़ाद” और “गुलाम” जैसी श्रेणियों में बांटता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून में पूरी तरह प्रतिबंधित है. किसी भी रूप में गुलामी को स्वीकार करना मानवीय गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है. विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान इस कोड के जरिए गुलामी जैसी स्थिति को अप्रत्यक्ष रूप से वैध बनाने की कोशिश कर रहा है.

119 आर्टिकल वाला विवादित दस्तावेज
इस महीने की शुरुआत में तालिबान नेतृत्व ने 119 धाराओं वाले इस कानूनी दस्तावेज को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य तालिबान-शासित अफगानिस्तान में न्यायिक प्रक्रिया को दिशा देना बताया गया है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह दस्तावेज न्याय से ज्यादा नियंत्रण और दमन का जरिया बन सकता है.

विरोधी गुटों और पूर्व अधिकारियों की तीखी प्रतिक्रिया
तालिबान शासन का विरोध करने वाले राजनीतिक गठबंधन ‘द सुप्रीम काउंसिल ऑफ नेशनल रेजिस्टेंस फॉर द सॉल्वेशन ऑफ अफगानिस्तान’ ने इस कानून को समानता और मानवाधिकारों के खिलाफ बताया है. उनका कहना है कि ये प्रावधान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को तोड़ते हैं और “मध्ययुग से भी ज्यादा बुरे” हैं. अफगानिस्तान के पूर्व अटॉर्नी जनरल मोहम्मद फरीद हामिदी ने भी इस दस्तावेज को नागरिकों का अपमान और मानवीय गरिमा पर सीधा हमला करार दिया है.

महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर बढ़ता दमन
महिला अधिकारों के मामले में तालिबान का रिकॉर्ड पहले ही बेहद खराब रहा है. बीते वर्षों में महिलाओं की शिक्षा, काम और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सख्त पाबंदियां लगाई गईं. महिलाओं द्वारा लिखी गई सैकड़ों किताबों पर प्रतिबंध और कई विषयों की पढ़ाई पर रोक पहले ही लग चुकी है. अब गुलामी जैसी प्रथा को कानूनी मान्यता देने की कोशिश को महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर एक और गंभीर प्रहार के रूप में देखा जा रहा है.

मानवता के लिए खतरनाक संकेत
विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि तालिबान का यह कदम अफगानिस्तान को और ज्यादा अलग-थलग करने वाला है. गुलामी जैसी अमानवीय व्यवस्था को दोबारा कानूनी ढांचा देने की कोशिश न सिर्फ अफगान समाज के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक खतरनाक संकेत मानी जा रही है.

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