श्रीलंका ने अमेरिका को दिखाया ठेंगा! US फाइटर जेट्स को लैंडिंग से किया मना, राष्ट्रपति बोले- हम नहीं झुकेंगे

ईरान-अमेरिका के बीच जारी युद्ध के बीच श्रीलंका ने अमेरिका के दो युद्धक विमानों को अपनी धरती पर लैंड करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया. इस फैसले की घोषणा आज की गई है.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: श्रीलंका ने मजबूत रुख अपनाते हुए अमेरिका के दो युद्धक विमानों को अपनी धरती पर लैंड करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया. यह फैसला मध्य पूर्व में चल रहे ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच आया है. राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में शुक्रवार (20 मार्च 2026) को इसकी घोषणा की और कहा कि देश अपनी तटस्थता बनाए रखेगा.

अमेरिकी अनुरोध ठुकराया गया

राष्ट्रपति दिसानायके ने बताया कि जिबूती बेस से आए दो अमेरिकी फाइटर जेट्स ने 4 और 8 मार्च को मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंडिंग की मांग की थी. ये विमान आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे. दोनों अनुरोधों को साफ मना कर दिया गया.

राष्ट्रपति ने कहा, "कई दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं. हम झुकेंगे नही. मध्य पूर्व का युद्ध चुनौतियां खड़ी करता है, लेकिन तटस्थ बने रहने के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे."

यह बयान अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर से मुलाकात के ठीक एक दिन बाद आया. दोनों नेताओं ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, व्यापार और खुले क्षेत्र को बढ़ावा देने पर चर्चा की थी.

ईरानी जहाज पर हमला और श्रीलंका की भूमिका

घटना का बैकग्राउंड मार्च की शुरुआत में हुआ. 4 मार्च को अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 80 किमी दूर अंतरराष्ट्रीय जल में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena पर टॉरपीडो हमला किया. इस हमले में जहाज डूब गया और 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए. कई लापता हुए और 32 घायल बचाए गए. श्रीलंका ने डिस्ट्रेस सिग्नल मिलते ही तुरंत खोज-बचाव अभियान चलाया. 

नौसेना और वायुसेना ने घटनास्थल पर पहुंचकर 87 शव बरामद किए और घायलों को गाले में इलाज दिया. शवों को सम्मान के साथ ईरान भेजा गया. हमले के बाद एक अन्य ईरानी सहायक जहाज IRIS Bushehr ने इंजन खराबी का हवाला देकर मदद मांगी. श्रीलंका ने मानवीय आधार पर इसे अनुमति दी और जहाज को त्रिंकोमाली बंदरगाह भेजा. वहां 204 नाविकों को ठहराया गया.

दोनों पक्षों से अनुरोध ठुकराए

श्रीलंका ने ईरान के जहाजों को भी पूर्ण पहुंच नहीं दी. राष्ट्रपति ने संसद में स्पष्ट किया कि अमेरिका और ईरान दोनों के अनुरोध ठुकराए गए ताकि देश किसी पक्ष की मदद या नुकसान न पहुंचाए. यह फैसला श्रीलंका की गैर-संरेखित नीति को मजबूत दिखाता है. यह घटना हिंद महासागर में बढ़ते तनाव को उजागर करती है. श्रीलंका ने साफ संदेश दिया कि उसकी जमीन या हवाई अड्डे किसी युद्ध में इस्तेमाल नहीं होंगे.

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