धार्मिक स्वतंत्रता या आर्थिक नियंत्रण का नया तरीका... क्या है हलाल सर्टिफिकेशन? जानिए मुस्लिम समुदाय के बीच क्यों हो रही इसकी चर्चा
हलाल सर्टिफिकेशन का दायरा अब सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह कई उद्योगों में अपनी जगह बना चुका है. मुस्लिम समुदाय में इसे लेकर चर्चा जोरों पर है. पहले हलाल प्रमाणन केवल मांस और खाद्य पदार्थों के लिए अनिवार्य था, लेकिन अब यह सीमेंट, लोहे की छड़ें, सौंदर्य प्रसाधन, दवाएं, और यहां तक कि बोतलबंद पानी तक पहुंच चुका है. ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि क्या यह धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा है, या एक सोची-समझी आर्थिक रणनीति?

Halal Certification: हलाल सर्टिफिकेशन का मुद्दा अब एक नई बहस का विषय बन गया है. यह केवल खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब सीमेंट, लोहे की छड़ें और यहां तक कि बोतलबंद पानी के लिए भी हलाल प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं. इस नई प्रवृत्ति ने देश में धार्मिक और आर्थिक पहलुओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि मांस के लिए हलाल प्रमाणपत्र जारी करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अब तो यह प्रमाणपत्र अन्य उत्पादों पर भी लागू किए जा रहे हैं. यह न केवल व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल रहा है, बल्कि एक समानांतर अर्थव्यवस्था के निर्माण की ओर भी इशारा करता है.
हलाल उद्योग का बढ़ता जाल
हलाल अब सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े ग्लोबल उद्योग का रूप ले चुका है. हलाल रहन-सहन, हलाल डेटिंग, और यहां तक कि हलाल सेक्स जैसे विषय भी अब चर्चा में हैं. इस्लाम को 'एक संपूर्ण जीवनशैली' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, और इसके तहत न केवल धार्मिक बल्कि आर्थिक नियम भी निर्धारित किए जा रहे हैं.
कैसे बढ़ रही है हलाल प्रमाणपत्र की अनिवार्यता?
एक समय था जब हलाल प्रमाणपत्र सिर्फ खाद्य उत्पादों तक सीमित था, लेकिन अब यह विभिन्न उद्योगों में अपनी पैठ बना चुका है. हलाल प्रमाणन एजेंसियां लोहे की छड़ों, सीमेंट और यहां तक कि बिजली की बैटरियों के लिए भी प्रमाणपत्र जारी कर रही हैं. इससे न केवल कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि धार्मिक प्रमाणन को व्यावसायिक उत्पादों तक क्यों बढ़ाया जा रहा है?
आर्थिक अलगाववाद की ओर बढ़ता कदम?
विशेषज्ञों का मानना है कि हलाल प्रमाणपत्र एक समानांतर इस्लामिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का प्रयास है. इससे बाजार में एक अलग ध्रुवीकरण पैदा हो सकता है, जहां गैर-मुस्लिम व्यापारियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा. अगर कोई गैर-मुस्लिम हलाल बाजार में व्यापार करना चाहता है, तो उसे शरिया कानून का पालन करना पड़ेगा, जिससे भारतीय बाजार दो भागों में बंट सकता है.
क्या यह धार्मिकता या व्यावसायिक चालबाजी?
हलाल प्रमाणपत्र को धार्मिक शुद्धता का प्रतीक बताया जाता है, लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या यह मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं के साथ आर्थिक लाभ उठाने की रणनीति है? इतिहास में कभी भी ऐसी कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं थी जो हलाल प्रमाणन जारी करती हो. यह एक नया चलन है, जिसे अब वैश्विक स्तर पर फैलाया जा रहा है.
क्या हलाल प्रमाणपत्र पर सरकार को लगाना चाहिए रोक?
भारत में विभिन्न धार्मिक समूहों के अपने आहार और जीवनशैली संबंधी नियम हैं, लेकिन सरकार को यह तय करना होगा कि क्या किसी विशेष धार्मिक मान्यता के आधार पर पूरे बाजार को संचालित किया जाना चाहिए? हलाल प्रमाणपत्र पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है, ताकि किसी भी धर्म के नाम पर आर्थिक नियंत्रण न किया जा सके.


