कैसे बना केदारनाथ मंदिर? महाभारत काल से क्या है इस धाम का कनेक्शन?

केदारनाथ धाम हिमालय में स्थित भगवान शिव का पवित्र ज्योतिर्लिंग है, जहां दर्शन करने से भक्तों के कष्ट दूर होने की मान्यता है. महाभारत काल से जुड़ी कथा के अनुसार, पांडवों की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग रूप में विराजमान हुए.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

उत्तराखण्ड की ऊंची हिमालयी पर्वत श्रंखलाओं के बीच स्थित केदारनाथ धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यह पवित्र तीर्थ हर शिव भक्त के लिए आस्था का केंद्र है, जहां पहुंचकर भक्त अपने जीवन को धन्य मानते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां दर्शन करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं और उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का आकार त्रिकोणीय माना जाता है, जो इसे अन्य ज्योतिर्लिंगों से अलग पहचान देता है.

महाभारत काल से जुड़ा है धाम का संबंध 

इस धाम का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने ही संबंधियों के वध के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की शरण लेने का निश्चय किया और काशी से लेकर हिमालय तक उनकी खोज में भटकते रहे. लेकिन भगवान शिव उनसे रुष्ट थे और उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे हर बार स्थान बदल लेते थे.

कथा के अनुसार, जब पांडव हिमालय पहुंचे तो भगवान शिव ने उनसे बचने के लिए बैल का रूप धारण कर लिया. उसी दौरान भीम ने उन्हें पहचान लिया और पकड़ने का प्रयास किया. इस कोशिश में उनके हाथ केवल बैल का कूबड़ ही लगा. माना जाता है कि इसी कूबड़ के रूप में भगवान शिव केदारनाथ में प्रकट हुए. पांडवों की भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पापों से मुक्ति प्रदान की और वहीं ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए.

एक अन्य मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में नर और नारायण नामक महान तपस्वी इस क्षेत्र में भगवान शिव की उपासना करते थे. उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. तब उन्होंने भगवान से वहीं स्थायी रूप से निवास करने की प्रार्थना की. उनकी इच्छा को स्वीकार करते हुए भगवान शिव केदारनाथ में ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए.

केदारनाथ धाम से जुड़ी कई रोचक बातें 

केदारनाथ धाम से जुड़ी कई रोचक बातें भी प्रचलित हैं. कहा जाता है कि पांडवों द्वारा निर्मित यह मंदिर लंबे समय तक बर्फ के नीचे दबा रहा, जिसके बाद आदि शंकराचार्य ने इसका पुनर्निर्माण कराया. यहां के कपाट हर वर्ष केवल छह महीने के लिए खुलते हैं और शीतकाल में मंदिर बंद रहता है. बंद होने के दौरान भी मंदिर में जलाया गया दीपक लगातार छह महीने तक जलता रहता है. इसके अलावा, मंदिर के पीछे स्थित ‘भीम शिला’ को 2013 की भीषण आपदा के समय मंदिर की रक्षा करने वाला माना जाता है, जिसे आज भी श्रद्धा से पूजा जाता है.

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