BMC चुनाव: ठाकरे परिवार की सत्ता खत्म! मुंबई की राजनीति पर भाजपा-शिंदे गठबंधन का कब्जा

बीएमसी चुनावों में भाजपा-शिंदे गठबंधन ने बहुमत हासिल कर ठाकरे परिवार की दशकों पुरानी सत्ता खत्म कर दी. 89 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली नेता बनकर उभरे.

Shraddha Mishra

मुंबई: बीएमसी चुनावों के नतीजों ने मुंबई की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दर्ज कर दिया है. भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) गठबंधन की जीत के साथ ही एशिया के सबसे अमीर नगर निकाय पर ठाकरे परिवार की दशकों पुरानी पकड़ टूट गई है. मुंबई ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के अन्य शहरी क्षेत्रों में भी शानदार प्रदर्शन के दम पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस राज्य की राजनीति में सबसे प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरकर सामने आए हैं.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने बीएमसी में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. पार्टी ने 2017 में जीती गई अपनी पिछली सर्वश्रेष्ठ 82 सीटों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए इस बार 227 वार्डों में से 89 सीटों पर जीत दर्ज की. वहीं, उसकी सहयोगी शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) को 29 सीटें मिलीं. इस तरह गठबंधन के खाते में कुल 118 सीटें आईं, जो बहुमत के आंकड़े 114 से कहीं ज्यादा हैं.

शिंदे गुट की सीमित सफलता

हालांकि गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला, लेकिन शिवसेना (शिंदे गुट) का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा. 2017 में अविभाजित शिवसेना के 84 पार्षद थे, जिनमें से अधिकांश एकनाथ शिंदे के साथ चले गए थे. इसके बावजूद उनका गुट केवल 29 सीटें ही जीत सका. इससे यह संकेत मिलता है कि शिवसेना के पारंपरिक गढ़ में शिंदे गुट को अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए अभी और संघर्ष करना होगा.

उद्धव ठाकरे की शिवसेना: गिरावट के बावजूद मौजूदगी

दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) ने 65 सीटें जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया. यह संख्या 2017 के 84 पार्षदों की तुलना में कम जरूर है, लेकिन पार्टी का पूरी तरह खत्म न होना यह दिखाता है कि उद्धव ठाकरे की राजनीतिक विरासत अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. चुनाव चिन्ह और संगठन का एक बड़ा हिस्सा खोने के बावजूद उनका गुट मुकाबले में बना रहा.

हिंदुत्व बनाम मराठी पहचान की लड़ाई

इस चुनाव में ठाकरे परिवार ने मराठी अस्मिता और स्थानीय पहचान को बड़ा मुद्दा बनाया. उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से करीब दो दशक बाद हाथ मिलाया और ‘मराठी मानुष’ की राजनीति को फिर से जीवित करने की कोशिश की. हिंदी विरोधी बयानबाजी और बाहरी बनाम स्थानीय की बहस को हवा दी गई. हालांकि, यह रणनीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकी. राज ठाकरे की एमएनएस को 52 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ छह सीटें ही मिलीं. एनसीपी (शरद पवार गुट) को भी केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा.

फडणवीस का जवाब और हिंदुत्व का संदेश

भाजपा ने ठाकरे परिवार के “मुंबई खतरे में है” वाले नैरेटिव को सिरे से खारिज कर दिया. देवेंद्र फडणवीस ने साफ कहा कि मराठी मानुष का गौरव सुरक्षित है और विकास तथा हिंदुत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. चुनाव नतीजों के बाद भाजपा नेताओं ने इसे अपने वैचारिक एजेंडे की जीत बताया. मंत्री नितेश राणे का बयान, “जो हिंदू की बात करेगा, वही महाराष्ट्र पर राज करेगा,” इस सोच को साफ दर्शाता है.

कांग्रेस और AIMIM का प्रदर्शन

कांग्रेस ने इस बार बीएमसी चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया, लेकिन उसे खास सफलता नहीं मिली. पार्टी को 26 सीटें मिलीं, जबकि उसकी सहयोगी वीबीए को आठ सीटों पर जीत मिली. वहीं, एआईएमआईएम ने चौंकाते हुए आठ सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, जो पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन है.

मुंबई की राजनीति का बदला नक्शा

कुल मिलाकर, बीएमसी चुनावों ने मुंबई की शहरी राजनीति की दिशा बदल दी है. ठाकरे परिवार ने भले ही अपनी प्रासंगिकता बचाए रखी हो, लेकिन यह चुनाव साफ तौर पर भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन के बढ़ते वर्चस्व को दर्शाता है. देवेंद्र फडणवीस के लिए यह जीत सिर्फ नगर निगम तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभाव के और मजबूत होने का संकेत है. वहीं, विपक्ष के लिए यह नतीजा 2029 के विधानसभा चुनावों से पहले एक कड़ा संदेश और चेतावनी माना जा रहा है.

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