जदयू में बड़ी कार्रवाई, पूर्व मंत्री और कई वरिष्ठ नेता पार्टी से निष्कासित

जनता दल (यूनाइटेड) ने अनुशासनहीनता और संगठन विरोधी गतिविधियों के आरोप में कई वरिष्ठ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

Bihar: बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने विधानसभा चुनाव से पहले कड़ा कदम उठाते हुए संगठन में बड़ी कार्रवाई की है. पार्टी नेतृत्व ने अनुशासनहीनता और संगठन विरोधी गतिविधियों के आरोप में कई वरिष्ठ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. जदयू की ओर से जारी आधिकारिक पत्र के मुताबिक, निष्कासित नेताओं में पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक और विधान पार्षद शामिल हैं. इस फैसले से प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है.

जदयू से किसे-किसे निकाला गया?

पार्टी के प्रदेश महासचिव एवं मुख्यालय प्रभारी चंदन कुमार सिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि जिन नेताओं को पार्टी से निष्कासित किया गया है उनमें पूर्व मंत्री शैलेश कुमार, पूर्व विधान पार्षद संजय प्रसाद, पूर्व विधायक श्याम बहादुर सिंह (बड़हरिया), रणविजय सिंह (बरहरा, भोजपुर) और सुदर्शन कुमार (बरबीघा) प्रमुख नाम हैं. इनके अलावा अमर कुमार सिंह (बेगूसराय), डॉ. आसमा परवीन (वैशाली), लव कुमार (नबीनगर, औरंगाबाद), आशा सुमन (कदवा, कटिहार), दिव्यांशु भारद्वाज (मोतिहारी) और विवेक शुक्ला (जीरादेई, सिवान) को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है.

पार्टी सूत्रों के अनुसार, इन नेताओं में से कई आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने से नाराज थे. कुछ ने बगावत करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा भी कर दी थी. इसे देखते हुए जदयू नेतृत्व ने संगठन की एकजुटता बनाए रखने के लिए यह कड़ा निर्णय लिया.

हाल ही में हम पार्टी ने भी इसी तरह की कार्रवाई की थी, जहां पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नेताओं को बाहर कर दिया गया था. अब जदयू द्वारा उठाए गए इस कदम को चुनावी अनुशासन स्थापित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेताओं को दिया संदेश

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी नेताओं को साफ संदेश दिया है कि संगठन में अनुशासनहीनता या बगावत को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा कि पार्टी उन्हीं लोगों के साथ आगे बढ़ेगी जो जदयू की विचारधारा, नीतियों और नेतृत्व के प्रति वफादार हैं.

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला जदयू की डैमेज कंट्रोल रणनीति का हिस्सा है. इससे पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह संगठन की मजबूती और अनुशासन पर कोई समझौता नहीं करेगी. माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में यह कदम पार्टी के लिए आंतरिक एकता और मतदाताओं के बीच विश्वास बहाली का संकेत साबित हो सकता है.

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