कोई नहीं बचता न्यूक्लियर हमले में, सिवाय इसके; जानिए क्यों अमर है कॉकरोच?

जब परमाणु बम फटता है, तो वह हजारों डिग्री सेल्सियस तापमान पैदा करता है, जिससे आसपास की हर चीज जलकर राख हो जाती है. इसके साथ ही भारी मात्रा में रेडियोधर्मी विकिरण निकलता है, जो जीवन के लिए बेहद खतरनाक होता है और कई सालों तक असर बनाए रखता है.

Dimple Yadav
Edited By: Dimple Yadav

तिलचट्टे (कॉकरोच) को अक्सर यह श्रेय दिया जाता है कि वे परमाणु हमलों में भी जीवित रहते हैं. हालांकि यह सच है कि वे रेडिएशन के प्रति इंसानों से कहीं अधिक सहनशील होते हैं, लेकिन यह धारणा पूरी तरह से सही नहीं है.

तिलचट्टे इंसानों की तुलना में 6 से 15 गुना अधिक रेडिएशन सहन कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों से उत्पन्न रेडिएशन का स्तर लगभग 10,000 रैड था. इस स्तर पर, आधे तिलचट्टे जीवित रहे. यहां तक कि 10,000 रैड तक की रेडिएशन में भी लगभग 30% तिलचट्टे स्वस्थ रहे. 

कोशिका विभाजन और रेडिएशन सहनशीलता:

तिलचट्टों की कोशिकाएं धीमी गति से विभाजित होती हैं, जिससे रेडिएशन का डीएनए पर प्रभाव कम होता है. जबकि इंसान की कोशिकाएं लगातार विभाजित होती रहती हैं, जिससे वे रेडिएशन के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं.

विनाशकारी परिस्थितियों में जीवित रहने की संभावना:

हालांकि तिलचट्टे रेडिएशन के प्रति सहनशील होते हैं, लेकिन परमाणु विस्फोट के केंद्र में अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण वे जीवित नहीं रह सकते. विस्फोट के केंद्र में तापमान सूर्य की सतह से भी अधिक होता है, जिससे कोई भी जीवित प्राणी जीवित नहीं रह सकता.

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