US ने दी राहत, क्या भारत खरीदेगा ईरानी तेल? समुद्र में मौजूद बड़े भंडार पर नजर
अमेरिका द्वारा ईरानी तेल पर अस्थायी छूट दिए जाने के बाद वैश्विक बाजार में हलचल तेज हो गई है. समुद्र में मौजूद बड़े भंडार के चलते अब भारत समेत एशियाई देशों की नजर इस तेल पर टिक गई है.

नई दिल्ली: अमेरिका द्वारा ईरानी कच्चे तेल पर अस्थायी छूट दिए जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है. इस फैसले का सीधा असर एशियाई देशों पर पड़ता दिख रहा है, जहां भारत भी अब ईरानी तेल की खरीद को लेकर फिर से सक्रिय होता नजर आ रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों पर काबू पाने के उद्देश्य से उठाए गए इस कदम के बाद भारतीय रिफाइनरियां भी संभावनाएं तलाश रही हैं. हालांकि, अंतिम फैसला लेने से पहले वे केंद्र सरकार के निर्देशों का इंतजार कर रही हैं.
भारतीय रिफाइनरियों की बढ़ती दिलचस्पी
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की तीन प्रमुख रिफाइनरियों ने संकेत दिया है कि वे ईरानी तेल खरीदने के लिए तैयार हैं. लेकिन भुगतान और लेन-देन की शर्तों को लेकर अभी स्पष्टता नहीं है, इसलिए सरकारी दिशा-निर्देश का इंतजार किया जा रहा है.
भारत का कच्चे तेल का भंडार अन्य एशियाई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है, ऐसे में सस्ते विकल्प के रूप में ईरानी तेल एक अहम भूमिका निभा सकता है.
अमेरिका ने दी 30 दिनों की अस्थायी छूट
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में पहले से मौजूद ईरानी तेल की बिक्री के लिए 30 दिनों की छूट प्रदान की है.
उन्होंने कहा "यह छूट समुद्र में स्थित ईरानी तेल पर होगा, जो 19 अप्रैल तक उतारने तक लागू रहेगा."
यह कदम अमेरिका द्वारा हाल के समय में तीसरी बार उठाया गया है, जब उसने वैश्विक आपूर्ति बनाए रखने के लिए प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है.
समुद्र में मौजूद है विशाल तेल भंडार
डेटा एजेंसी केप्लर के मुताबिक, करीब 170 मिलियन बैरल यानी 17 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल जहाजों पर समुद्र में जमा है. यह भंडार मिडिल ईस्ट से लेकर चीन के नजदीकी समुद्री क्षेत्रों तक फैला हुआ है.
वहीं, एनर्जी एस्पेक्ट्स के अनुमान के अनुसार, 13 से 14 करोड़ बैरल तेल समुद्र में मौजूद है, जो मिडिल ईस्ट के लगभग 14 दिनों के उत्पादन के बराबर है.
एशिया की बढ़ती निर्भरता और दबाव
एशिया अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत मिडिल ईस्ट से पूरा करता है. ऐसे में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने जैसी स्थिति ने आपूर्ति पर दबाव बढ़ा दिया है.
इसका असर यह हुआ है कि कई रिफाइनरियों को कम क्षमता पर संचालन करना पड़ रहा है और ईंधन निर्यात में भी कटौती करनी पड़ रही है.


