51 रुपये की फीस से इंडस्ट्री में दस्तक...राजेश खन्ना और अमिताभ के दौर में भी धर्मेंद्र की लोकप्रियता, इन दिग्गजों के सहयोग से बदली किस्मत
धर्मेंद्र का फिल्मी सफर संघर्ष, सादगी और बेफिक्र जज़्बे का अनोखा मेल रहा. 51 रुपये की पहली कमाई से शुरुआत करने वाले इस कलाकार ने बंदिनी जैसी फिल्मों से पहचान बनाई. मीना कुमारी और हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी ने उन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

मुंबई : धर्मेंद्र की छवि हिंदी सिनेमा में हमेशा सबसे अलग रही है मजबूत कद-काठी, देसी अंदाज, उजली मुस्कान और भीतर से बेहद संवेदनशील दिल. “मैं जट यमला पगला दीवाना…” वाला उनका अंदाज सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि उनकी पूरी शख्सियत का सुरीला परिचय था. वह स्टारडम को कभी सिर पर नहीं चढ़ने देते थे और किसी सम्मान या सुपरस्टार की प्रतिस्पर्धा से खुद को कभी नहीं जोड़ा. उनकी सहजता और बिंदास मिजाज ने उन्हें दर्शकों का सच्चा प्रिय बना दिया.
विनोद खन्ना और मिथुन से आत्मीय रिश्ता
पहली फिल्म के लिए मिले सिर्फ 51 रुपये
दरअसल, 1960 का समय था जब धर्मेंद्र फिल्मफेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतकर फिल्मों की दुनिया में आए. पहली फिल्म मिली दिल भी तेरा, हम भी तेरे और इसके लिए उन्हें मिले सिर्फ 51 रुपये. यह रकम मामूली थी लेकिन यही उनकी लंबी यात्रा की शुरुआत बनी. फिल्म फ्लॉप हुई, संघर्ष जारी रहा, खाने-रहने तक की तय जगह नहीं थी, लेकिन हौसला बरकरार रहा. बाहरी कलाकार होते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी. गांव की मिट्टी से उठकर महानगर में ठिकाना बनाना आसान नहीं था, पर उन्होंने यह रास्ता खुद बनाया.
मनोबल टूटता गया, पर मनोज कुमार ने थामा हाथ
लगातार मिल रही असफलताओं से धर्मेंद्र निराश हो चुके थे और लगभग तय कर चुके थे कि पंजाब लौट जाएंगे. उसी समय उनके घनिष्ठ मित्र मनोज कुमार ने उन्हें संभाला. दोनों उस समय संघर्षरत थे, लेकिन मनोज कुमार ने कहा यदि दो रोटियां कमाएंगे, तो आधी-आधी बांटकर खाएंगे. यही शब्द धर्मेंद्र के लिए संबल बन गए. वर्षों बाद मनोज कुमार के निधन पर धर्मेंद्र की खामोशी उनकी दोस्ती की गहराई को बयान कर गई.
संघर्ष से सफलता तक की छलांग
1963 में आई बंदिनी ने धर्मेंद्र के करियर की दिशा बदल दी. बिमल रॉय के निर्देशन और अशोक कुमार–नूतन जैसे दिग्गजों के साथ काम करने का यह अवसर अमूल्य साबित हुआ. इस फिल्म से उन्हें पहली बार उचित पारिश्रमिक पांच हजार रुपये मिला, जिससे उन्होंने अपनी पहली कार खरीदी. उन्होंने सोचा था कि अगर फिल्मों में काम न मिला, तो टैक्सी चलाकर गुज़ारा कर लेंगे. लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और बंदिनी तथा इसके बाद आने वाली मिलन की बेला जैसी फिल्मों ने उन्हें मजबूत जगह दिलाई.
मीना कुमारी के साथ पर्दे पर निखरती केमिस्ट्री
मीना कुमारी को हमेशा ऐसा कलाकार माना गया, जिसके सामने किसी भी नायक का प्रभाव दबा हुआ लगता था. लेकिन धर्मेंद्र वह सितारा साबित हुए जिनके साथ उनकी जोड़ी सबसे सफल रही. काजल, पूर्णिमा, फूल और पत्थर, मझली दीदी और चंदन का पालना जैसी फिल्मों में दोनों ने बेहतरीन काम किया. इन फिल्मों के दौरान उनके आपसी समीकरण की भी खूब चर्चा रही, और मीना कुमारी के धर्मेंद्र के लिए लगाव की बातें समय-समय पर सामने आती रहीं.
पर्दे की हिट जोड़ी से जीवन साथी तक
सत्तर के दशक में हेमा मालिनी की एंट्री के साथ हिंदी सिनेमा में नया अध्याय खुला. उनकी खूबसूरती, नृत्य और अभिनय का जादू दर्शकों को बांध रहा था. इसी दौर में धर्मेंद्र और हेमा की जोड़ी ने फिल्मों में धूम मचा दी तुम हसीन मैं जवान, शराफत, सीता और गीता, शोले, ड्रीम गर्ल और आस पास जैसी फिल्मों ने इस जोड़ी को यादगार बना दिया. हेमा मालिनी की चमक के बीच धर्मेंद्र की उपस्थिति हमेशा ऊर्जा और भावनात्मक ऊष्मा लेकर आती थी.
राजेश, अमिताभ के दौर में धर्मेंद्र की लोकप्रियता
जब राजेश खन्ना का सुपरस्टारडम आसमान छू रहा था और अमिताभ बच्चन का एंग्री यंग मैन अवतार दर्शकों को मोह रहा था, तब भी धर्मेंद्र अपनी तरह से कायम रहे. शोले में पानी की टंकी वाला उनका दृश्य आज भी क्लासिक माना जाता है. चुपके चुपके में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने दर्शकों को चौंकाया. ऐसा शायद ही कोई दौर रहा हो जब धर्मेंद्र की लोकप्रियता फीकी पड़ गई हो.
‘अपने’ से लेकर ‘रॉकी और रानी…’ तक
लंबे समय बाद 2007 में अपने के साथ धर्मेंद्र फिर पर्दे पर लौटे, और सनी–बॉबी के साथ भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाए रखी. रॉकी और रानी की प्रेम कहानी तथा तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया जैसी हालिया फिल्मों में भी उनकी उपस्थिति ने दर्शकों को भावनात्मक और स्नेहपूर्ण जुड़ाव दिया. अब उनकी आगामी फिल्म इक्कीस से दर्शकों को एक बार फिर उनकी पुरानी चमक देखने की उम्मीद है.


