15 साल की उम्र में क्रिश्चियन बन गए रेमो डिसूजा, अब हिन्दू देवी-देवताओं की क्यों कर रहे पूजा? घर में शिवलिंग रखने का किया खुलासा
बॉलीवुड के जानें मानें हस्ती रेमो डिसूजा और उनकी पत्नी लिजेल ने एक पॉडकास्ट के दौरान अपने धर्म को लेकर बात की. अब दोनों धीरे-धीरे हिन्दू पूजा-पाठ की तरफ झुकाव कर रहे हैं.

नई दिल्ली: बॉलीवुड के प्रसिद्ध कोरियोग्राफर रेमो डिसूजा और उनकी पत्नी लिजेल ने हाल ही में अपनी आस्था और आध्यात्मिक यात्रा के बारे में खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि कैसे उनकी मान्यताएं एक धर्म तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई धर्मों के तत्वों को सम्मान देती हैं.
एक पॉडकास्ट में हुई इस चर्चा में रेमो ने अपने बचपन के फैसले और परिवार के समर्थन का जिक्र किया, जबकि लिजेल ने हिंदू पूजा-पाठ के प्रति अपने झुकाव को साझा किया.
बचपन में हुआ धर्म परिवर्त
नरेमो डिसूजा का जन्म रमेश गोपी नायर के नाम से हुआ था. 15 साल की उम्र में उन्होंने ईसाई धर्म अपनाने का फैसला किया. चर्च से जुड़े काम करते हुए उन्हें लगा कि वे इससे और गहराई से जुड़ना चाहते हैं. रेमो ने बताया कि उन्होंने अपने पिता से इस बारे में बात की.
पिता ने कहा, “ठीक है, कर ले. बस मेरा नाम मत बदलना.” इसी वजह से उनका पूरा नाम रेमो गोपी डिसूजा हो गया. परिवार ने इस फैसले को बिना किसी दबाव के स्वीकार कर लिया, जो रेमो के लिए बहुत महत्वपूर्ण था.
घर में सभी धर्मों का सम्मान
लिजेल डिसूजा ने बताया कि उनके माता-पिता के गुजर जाने के बाद पिछले 4-5 सालों में उनका मन हिंदू धर्म की ओर ज्यादा झुकने लगा. वे कहती हैं, “मैं कैथोलिक हूं, लेकिन अब सारी पूजा-पाठ करती हूं और मुझे इसमें अच्छा लगता है.”
उनके घर में भगवान शिव की बड़ी प्रतिमा और छोटा शिवलिंग रखा हुआ है. इसके अलावा इसाह मसीह की प्रतिमा के साथ भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की मूर्तियां भी हैं. पूजा सभी की होती है. इससे साफ है कि उनका घर सभी धर्मों का सम्मान करने वाला है.
रेमो की कोरियोग्राफी की उपलब्धियां
रेमो डिसूजा बॉलीवुड के सबसे सफल कोरियोग्राफरों में से एक हैं. उन्होंने कई यादगार गानों पर काम किया है. इनमें ‘बदतमीज दिल’, ‘डिस्को दीवाने’, ‘बलम पिचकारी’, ‘दीवानी मस्तानी’, ‘पिंगा’ और ‘घर मोरे परदेसिया’ जैसे हिट गाने शामिल हैं.
उनकी कोरियोग्राफी हमेशा एनर्जी और क्रिएटिविटी से भरी होती है, जो फिल्मों को और आकर्षक बनाती है. दोनों ने यह भी बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को किसी एक धर्म के दबाव में नहीं रखा, बल्कि स्वतंत्रता दी ताकि वे खुद अपनी राह चुन सकें.


