ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की हड़बड़ी, एलओसी पर क्यों टूट गया सैन्य संतुलन जब गोलियों से पहले डर चला
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एलओसी पर जो दिखा, वह सामान्य युद्ध नहीं था। यह पाकिस्तान की बदहवासी, भारतीय सेना के धैर्य और एक निर्णायक सुबह की कहानी है।

ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सीमापार हमलों तक सीमित नहीं था। इसका असर एलओसी तक साफ दिखा। 8 और 9 मई की रात पाकिस्तानी सैनिकों में बेचैनी फैल चुकी थी। उन्हें लग रहा था कि भारतीय सेना किसी भी वक्त जमीनी कार्रवाई शुरू करेगी। यह डर आदेशों से बड़ा हो गया। चौकियों पर तैनात जवान बिना स्पष्ट निर्देश के हरकतें करने लगे। यही से संतुलन टूटना शुरू हुआ। डर ने कमांड सिस्टम को कमजोर कर दिया। अफसरों और जवानों के बीच तालमेल बिगड़ने लगा। रेडियो पर आवाजें ज्यादा थीं, निर्देश कम थे। ऑपरेशन सिंदूर ने बिना सीमा पार किए एलओसी पर दबाव बना दिया। यह दबाव गोलियों से ज्यादा भारी साबित हुआ।
क्यों बिना लक्ष्य गोलियां चलीं?
एलओसी पर पाकिस्तानी सैनिक नालों और गड्ढों में गोलियां दाग रहे थे। कोई तय निशाना नहीं था। कोई रणनीति नहीं थी। यह फायरिंग जवाब नहीं थी। यह घबराहट थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्हें भारतीय सेना की चुप्पी ज्यादा खतरनाक लग रही थी। गोलियां इस बात का संकेत थीं कि नियंत्रण हाथ से फिसल रहा था। यह फायरिंग डर छुपाने की कोशिश थी। अंधेरे में आवाज पैदा करने का तरीका था। ताकि अपने ही अफसरों को दिखाया जा सके कि चौकी सक्रिय है। लेकिन इससे कमजोरी और उजागर हो गई। यह युद्ध नहीं, बेचैनी का शोर था।
लैंड माइंस उखाड़ने का मतलब?
9 मई की रात पाकिस्तानी सैनिकों ने जमीन में बिछी लैंड माइंस हाथ से हटानी शुरू कर दीं। यह सैन्य अभ्यास नहीं होता। यह तब होता है जब सैनिक को लगता है कि पीछे हटना पड़ सकता है। माइंस हटाना बताता है कि चौकी बचने का भरोसा खत्म हो चुका था। ऑपरेशन सिंदूर ने मनोवैज्ञानिक दबाव बना दिया था। माइंस आमतौर पर रक्षा के लिए होती हैं। उन्हें हटाना भागने की तैयारी का संकेत है। यह फैसला ऊपर से नहीं आया था। यह डर से लिया गया कदम था। इससे साफ हुआ कि सैनिक भविष्य नहीं, अगले कुछ घंटे देख रहे थे। ऑपरेशन सिंदूर ने सोच की दिशा बदल दी थी।
तोपें थीं पर योजना नहीं?
9 और 10 मई की रात पाकिस्तान ने तोपें चलाईं। लेकिन यह फायरिंग असरहीन रही। गोले बिना चयनित लक्ष्य के दागे गए। भारतीय पोस्ट सुरक्षित रहीं। यह साफ दिखा कि हथियार तो थे, लेकिन दिशा नहीं थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी कमांड असमंजस में था। जवाब देना था, पर समझ नहीं आ रहा था कैसे। तोपें इसलिए चलीं ताकि ऊपर रिपोर्ट भेजी जा सके। असल नुकसान पहुंचाने की क्षमता नहीं दिखी। यह फायरिंग दबाव कम करने की कोशिश थी। लेकिन इससे भ्रम और बढ़ गया। योजना के बिना ताकत बेअसर साबित हुई।
भारतीय सेना ने इंतजार क्यों किया?
भारतीय सेना ने जल्दबाजी नहीं की। पूरी स्थिति को शांत रहकर देखा। हर हरकत नोट की गई। यह चुप्पी कमजोरी नहीं थी। यह तैयारी थी। ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति यही थी। पहले दबाव बनाओ। फिर सही समय पर वार करो। भारतीय पोस्ट पर कोई घबराहट नहीं थी। सैनिक अपने बंकरों में स्थिर थे। हर मूवमेंट दर्ज किया जा रहा था। दुश्मन की जल्दबाजी भारतीय पक्ष के लिए जानकारी बन रही थी। यह इंतजार ही असली बढ़त था। सही वक्त पर फैसला लेने की जमीन यहीं बनी।
सुबह छह बजे क्या बदला?
10 मई की सुबह करीब छह बजे भारतीय सेना ने मोर्टार फायरिंग शुरू की। हर शेल अपने लक्ष्य पर गिरा। एक भी गोला नहीं भटका। पाकिस्तानी चौकियां टूट गईं। पीछे छिपाया गया टैंक भी सुरक्षित नहीं रह सका। एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल ने स्थिति पलट दी। यह हमला अचानक नहीं था। यह पूरे घटनाक्रम का नतीजा था। सटीकता ने फर्क पैदा किया। कुछ ही मिनटों में तस्वीर बदल गई। पाकिस्तानी टैंक को पीछे हटना पड़ा। सुबह ने साफ कर दिया कि नियंत्रण किसके पास है।
ऑपरेशन सिंदूर का असली संदेश?
यह कार्रवाई सिर्फ सैन्य जीत नहीं थी। यह संदेश था। भारतीय सेना न शोर मचाती है, न घबराती है। वह इंतजार करती है और सटीक वार करती है। ऑपरेशन सिंदूर ने एलओसी पर यह साफ कर दिया कि डर किस तरफ है और नियंत्रण किसके हाथ में। यह संदेश सिर्फ पाकिस्तान के लिए नहीं था। यह हर उस ताकत के लिए था जो धैर्य को कमजोरी समझती है। भारतीय सेना ने बताया कि रणनीति आवाज से नहीं, असर से पहचानी जाती है। ऑपरेशन सिंदूर ने यह फर्क साफ कर दिया।


