'सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है...' जूता कांड का जिक्र कर ऐसा क्यों बोले चीफ जस्टिस

देश के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कोर्ट में बड़ी टिप्पणी की है. चीफ जस्टिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है, इसकी जानकारी कोर्ट के जजों को है. चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर प्रसारित उस नकली वीडियो को लेकर की है, जिसके अंदर कोर्ट रूम में जूता फेंकने के प्रयास को गलत तरीके से दर्शाया गया है.

Anuj Kumar
Edited By: Anuj Kumar

नई दिल्ली: नई दिल्ली: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI)जस्टिस बी. आर. गवई ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक अहम टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि आजकल सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है, इसकी पूरी जानकारी अदालत के जजों को होती है. चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर प्रसारित एक नकली वीडियो को लेकर की है, जिसके अंदर कोर्ट रूम में जूता फेंकने के प्रयास को गलत तरीके से दर्शाया गया है.

'पूरी तरह वाकिफ हैं'

CJI गवई ने कहा कि वे और अन्य जज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)और अन्य डिजिटल तकनीकों के गलत इस्तेमाल से पूरी तरह वाकिफ हैं. उन्होंने साफ कहा कि अदालतें भी जानती हैं कि सोशल मीडिया पर कैसे AI के जरिए भ्रामक सामग्री तैयार की जा रही है और यह न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है.

'हां-हां हमने भी वीडियो देखा है'

यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश ने उस जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान की, जिसमें याचिकाकर्ता ने भारतीय न्यायपालिका में एआई के उपयोग को नियंत्रित (Regulate)करने के संबंध में दिशा निर्देश या नीति बनाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की है.

कई जोखिम और कमियाँ भी जुड़ी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील ने कहा कि आजकल अदालतों में एआई उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, लेकिन इनके साथ कई जोखिम और कमियाँ भी जुड़ी हैं. इसी बीच CJI गवई ने कहा कि हां-हां हमने भी छेड़छाड़ किया हुआ वीडियो देखा है. 

दो हफ्तों बाद अगली सुनवाई

इसके बाद CJI गवई ने याचिकर्ता से पूछा कि आप इस याचिका को अभी खारिज करना चाहते हैं या दो हफ्ते बाद देखना चाहते हैं. जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई दो हफ़्ते बाद तय कर दी. 

बड़ा सवाल खड़ा किया 

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब एआई तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है, तो उसके नैतिक और कानूनी दायरे तय करना अब बेहद जरूरी हो गया है, ताकि अदालतों और न्याय प्रणाली की गरिमा सुरक्षित रह सके.

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